
मायावती की शोहरत अब देश के बाहर भी फैल रही है। फोर्ब्स ने उनको देश की महाशक्शिली महिलाओं में शामिल कर लिया है। इस बात पर शायद किसी को एतराज होगा। एक निम्न मध्यवर्गीय दलित परिवार से आने वाली मायावती के लिए राह बनाना आसान नहीं , लेकिन अपने बुलंद इरादों से देश के करोड़ों दलित लोगों के बीच सर्वमान्य नेता के रूप में उभरी। फोर्ब्स पत्रिका द्वारा स्कूल की पगडंडी से सत्ता के गलियारों तक का सफर तय करके चौथी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी बहुजन समाज पार्टी (बसपा)की अध्यक्ष मायावती के नाम को विश्व की सौ सर्वाधिक प्रभावशाली महिलाओं में शुमार किया जाना देश के सर्वसमाज में उनक ी बढ़ती पैठ का परिचायक है। कभी स्कूल में शिक्षक रहीं मायावती ने पिछले साल हुए राज्यविधानसभा के चुनाव में कामयाब सोशल इंजीनियरिंग के सहारे अपनी पार्टी को स्पष्ट बहुमत दिलाकर चौथी बार राज्य की मुख्यमंत्री बनने का अनूठा कीर्तिमान रचा। अपने सख्त प्रशासनिक रवैए के लिए मशहूर तथा पार्टी क ाडर के बीच 'बहनजी' के नाम से पहचानी जाने वाली सुश्री मायावती और उनकी पार्टी के लिए बसपा के संस्थापक कांसीराम का वर्ष 2006 में निधन एक बड़ा झटका था, लेकिन उन्होंने इससे पार्टी के मनोबल में कोई कमी नहीं आने दी। ताज कोरिडोर घोटाले में सुश्री मायावती के खिलाफ जांच का राज्यविधानसभा चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन पर विपरीत असर पड़ने कीअटकलें भी गलत साबित हुई। इस चुनाव में दलित-ब्राह्मण समीकरण के सहारे चुनाव लड़ने का बसपा का दांव चारों खाने सटीक बैठा और पार्टी ने विरोधियों को मीलों पीछे छोड़ दिया।सुश्री मायावती का जन्म 15 जनवरी 1956 को दिल्ली में हुआ था।उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद जिले के बादलपुर गांव के मूल निवासीउनके पिता प्रभुदयाल टेलीग्राफ विभाग में सुपरवाइजर के पद परकार्यरत थे।मायावती की अधिकांश शिक्षा-दीक्षा दिल्ली में ही हुई औरउन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के कालिन्दी कॉलेज से स्नातक एवंएल.एल.बी. की उपाधि हासिल करने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से बी.एड. की डिग्री भी हासिल की। अपने छात्र जीवन के दौरान विभिन्न सामाजिक गतिविधियों एवं छात्र आन्दोलनों में सक्रिय रहीं सुश्री मायावती ने इस दौरान समाज के दबे-कुचले वर्ग के लोगों की समस्याओं के खिलाफ आवाज बुलंद की। वर्ष 1977 से 1984 तक सुश्री मायावती ने दिल्ली में विभिन्न स्कूलों को शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दीं, लेकिन दलितों व समाज के कमजोर वगरें की समस्याओं के खिलाफ आवाज उठाने की तीव्र इच्छा उन्हें स्कूल की पगडंडी से राजनीति के गलियारों तक ले आई और वर्ष 1984 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी। उसी दौरान उन्हें अपने राजनीतिक गुरु कांसीराम का साथ मिला और फिर वह राजनीति के जरिए जनसेवा में रम गई।वर्ष 1984 में वह अराजनीतिक संगठन दलित एवं अल्पसंख्यकवर्ग कर्मचारी महासंघ (बामसेफ) से जुड़ गई और फिर उन्होंने दलितों एवं पिछड़ों के हितों के लिये संघर्ष करने वाले एक अन्य संगठन (डीएस-4) से नाता जोड़ा। चौदह अप्रैल 1984 को बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की स्थापना के बाद सुश्री मायावती के राजनीतिक सफर की असल शुरुआत हुई और उन्होंने उसी साल पार्टी के टिकट पर मुजफ्फरनगर जिले की कैरानासंसदीय सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली। इसके बाद सुश्री मायावती 1985 और 1987 में बिजनौर एवंहरिद्वार संसदीय सीट के उपचुनाव के लिये मैदान में उतरीं और हरिद्वार में 1.39 लाख मत हासिल करके दूसरे स्थान पर रही। सुश्री मायावती को पहली चुनावी सफलता वर्ष 1989 में राज्यविधानसभा की बिजनौर सीट पर मिली। बाद में वर्ष 1994 में वह बसपा की राज्यसभा सदस्य के रूप में चुनी गई। वर्ष 1993 में उनकी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) की मदद की, लेकिन दो जून 1995 को कथितरूप से सपा कार्यकर्ताओं द्वारा सुश्री मायावती पर जानलेवा हमले केबाद दोनों दलों के रिश्तों में कड़वाहट पैदा हो गई।मनुवादी ताकतंों की मुखर विरोधी सुश्री मायावती इस हमले मेंबाल-बाल बच गई और तीन जून 1995 को भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) की मदद से वह पहली बार राज्य की मुख्यमंत्री बनीं हालांकि उनका कार्यकाल सिर्फ चार माह का रहा और भाजपा-बसपा गठबंधन बिखर जाने की वजह से अक्टूबर माह में उनकी सरकार गिर गई। सरकार गिरने के बावजूद सुश्री मायावती की राजनीतिक साख में कमी नहीं आई और वर्ष 1996 में हुए राज्य विधानसभा चुनाव में उन्होंने बदायूं जिले की बिल्सी और सहारनपुर जिले की हरौड़ा सीट पर जीत हासिल की1 एक ही सीट का प्रतिनिधित्व करने की राजनीतिक बाध्यता की वजह से बाद में उन्होंने बिल्सी सीट छोड़ दी। वर्ष 1997 में बसपा ने एक बार फिर भाजपा का दामन थामा और दोनों दलों के बीच छह-छह माह के अंतराल पर नेतृत्व परिवर्तन की शर्त पर समझौता हुआ और सुश्री मायावती 21 मार्च 1997 को दूसरी बार राज्य की मुख्यमंत्री बनीं लेकिन छह माह बाद बसपा ने राज्य में दलित अधिनियम का समुचित क्रियान्वयन नहीं होने का आरोप लगाते हुए सरकार से समर्थन वापस ले लिया और दोनों दलों का गठबंधन एक बार फिर टूट गया। बसपा की सर्वेसर्वा की छवि रखने वाली सुश्री मायावती नेवर्ष1998 और 1999 में हुए चुनाव में अम्बेडकरनगर जिले की अकबरपुर (सु) लोकसभा पर जीत हासिल की। राज्य विधानसभा के वर्ष 2002 में हुए चुनाव में चतुराअीपूर्ण ढंग से टिकट वितरण करके बसपा ने आलोचकों के तमाम दावों को झुठलातेहुए अच्छी सफलता हासिल की। सुश्री मायावती ने सहारनपुर जिले की हरौड़ा और अम्बेडकर नगर की जहांगीरगंज विधानसभा सीटें जीतीं। बाद में उन्होंने जहांगीरगंज सीट छोड़ दी। सुश्री मायावती ने राज्य की मुख्यमंत्री के रूप में अपनी तीसरी पारी एक बार फिर भाजपा के सहयोग से तीन मई 2002 को शुरू की, लेकिन ताज हेरिटेज कॉरिडोर मामले में उनका नाम सामने आने एवंउच्चतम न्यायालय द्वारा इस मामले के साथ-साथ सुश्री मायावती केखिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो( सीबीआई) से कराने के आदेश के बाद भाजपा व बसपा गठबंधन एक बार फिर बिखर गया और राज्य सरकार गिर गई। वर्ष 2007 में स्पष्ट बहुमत के साथ चौथी बार राज्य की सत्ता कीबागडोर संभालने के बाद सुश्री मायावती ने केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार से कभी नरम-कभी गरम रिश्तों के चलते इस साल के मध्य में केंद्र सरकार से पहले समर्थन वापस लिया। बाद में वाम दलों के समर्थन वापस लेने पर केंद्र की मनमोहनसरकार द्वारा 22 जुलाई को विश्वासमत हासिल करते समय उन्होंनेजिस राजनीतिक कौशल का परिचय दिया उससे उनका नाम यकायक प्रधानमंत्री पद की सशक्त दावेदार के रूप में उभरा और वह तीसरे मोर्चे की कद्दावर नेता के रूप में प्रतिष्ठित हो गई। उनक ी बढ़ती लोकप्रियता की गूंज अब सात समुन्दर पार तक पहुंचचुकी है और फोर्ब्स पत्रिका ने उनका नाम विश्व की सौ सर्वाधिकप्रभावशाली महिलाओं की सूची में शामिल किया।
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