Saturday, December 27, 2008

बेबसता की छलक

हट साले..रोज-रोज चला आता है भिख मांगने। तेरे मां-बाप नहीं है क्या? वह चिढ़ते हुए कहा। हर दिन हराम की कमाई खाने की आदत है साले को। ऐसे लोगों की न जात का पता होता है न घरवालों का! ऐ तो अपने जन्म का भोग रहे हैं। ऐसे कहने वाले वही साहब थे, जो हर रोज स्टेशन पर दोस्तों की महफिल लगाए रहते थे। उनकी नजरें हर उस सुंदर लोगों पर रहता था, जो देखने में..ये तो आप समझा सकते हैं। इतने में वहां चार-पांच बच्चे उनकी पांव छूकर कहने लगे माई-बाप पैसे दे दो, खाने को कुछ भी नहीं है। क्यों तेरी मां भाग गई क्या? बेबसता की छलक उनकी आंखों में साफ दिखाई दे रहा है। मगर क्या करते समाज के मारे थे। कुछ ही दूरी पर खड़ी एक बेजान सी महिला लड़खड़ाते चली आ रही थी, उसके कपड़े बिखड़े? बाल फैले थे। उसकी आंखों की नीचे स्याह काले घेरे थे। देख कर लग रहा था जैसे उसका कोई अपना खो गया या उसके साथ कुछ हो गया है। उसकी एक ही रट थी बाबू जी कुछ दे दो! बाबू जी कुछ दे दो! कुछ लोग उसकी लाचारी को देख मजाक कर रहे थे कही गई होगी! फिकरे के साथ मजे ले रहे लोगों में एक भले इनसान बुदबुदाया। अजीब कूढ़मगज लोग है मजे ले रहे हैं, लेकिन लाचार था। ज्यादा कुछ कहता तो लोग कहते ईमानदारी और सहिष्णुता का घुटी पिलाने आया है।

Monday, December 22, 2008

यकीन...



रात को बिजली की गड़गड़ाहट के साथ बारिश की बंदे की टप-टप की अवाजें सीने में हलचल मचा रहा था। लोग अपनी नींद की आगोश में थे। सपनों की दुनिया देख रितु को भी सुबह की बेला में झपकी लगी थी कि अचानक में किसी की आवाज सुनकर उठ गई। अरे वह यहां! उसका एहसास गगनचुभी भेदी की तरह उसके दिल को छेद कर लिया। वह छत पर आसपास इधर-उधर देखने लगी। सड़कों पर पहले जैसे चहल-पहल थी, लेकिन पेड़-पौधे गुमशुम व शांत किसी तुफान के इंतजार में, कहीं कोई अपना नहीं दिखा, न ही हवा चली और न पत्ते हिले। कही रितु का भ्रम तो नहीं या भूत-प्रेत का चक्कर। लोग अक्सर कहां करते है पहाड़ों के आसपास के शहरों में ऐसी घटनाएं हवाएं द्वारा घटित होती है..। अरे नहीं रितु को ऐसी बातों पर विश्वास नहीं था। उसने आकाश को देखा, चांद-तारों का मिलन। कितनी दूर से तारे अपनी रोशनी से चांद को रोशन कर रहा था। तभी उमड़-धमड़ कर बादलों का आना, बारिश की बंदों का टपकना, पेड़-पौधों का हिलोर मारना। रितु का मन हुआ मदमाती बलखाती सुहानी मौसम के सौंदर्य को कैद लें..तभी सहस हवा का झोंका आया और रितु को आगोश में ले लिया। बर्फीली हवा का छेदन उसके शरीर पर होने लगा, उसने दुपट्टे को कस कर लपेटा। उस फिजा पर मोहित हो अंदर आ गई।
उसकी नींद उचट चुकी थी। किसी का अहसास उसकी दिल की धड़कन बन चुका था, जो रूक-रूक कर तेज धड़क रहा था। चाय पीते हुए अपनी दोस्त (रानी) को इस बात का बयान किया, ऐसे कैसे हो सकता है वह यहां मुझे पुकारे। वह हंसती हुई कहती है पागल हो गई है, कहीं भूत-प्रेत का चक्कर तो नहीं। उसने सहानुभूति देते हुए समझाया जिंदगी की कशमकश से जूझती ये अनुभूति तुम्हारी अंतआत्मा में उस क्षण को कैद कर लिया है.। तुम उसको और उसके अहसास कासे अपनी धड़कन और परछाईयों में देखती हो। क्य कह रही हो..? रितु रानी का चेहरा देखती ही रह गई। हां, तुम्हारा मन उस क्षण को समेट लिया...। वह प्रेम का वैभव है, तभी तुम्हें पोरू की पुकारने की आवाज सुनाई दी..। ऐसा तभी होता है जब दूर होते हुए भी कोई अपना दिल से याद करें। प्रेम जीवन की प्रतिध्यनि है..समझी। रितु की मायूस चेहरा को देखते रानी चाय पीने लगी, दोनो घनिष्ट मित्र थीं। एक-दूसरे की हर छोटी-बड़ी बातों को जानती थी। तुम पोरू से मिल क्यों नहीं लेती रितु..? अरे तुम्होर आंखों में आंसू.., क्यों रो रही हो..क्या हुआ रितु?
रितु का कंठ अवरूद्घ हो गया, उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था, मुझे कुछ भी अ'छा नहीं लग रहा रानी। मुझे क्या हो रहा..हर वक्त उसकी याद आती रहती है, लेकिन उसको मेरी परवाह नहीं, रितु की आंखों से नीर अविरल बहने लगी, मैं पोरू के बिना नहीं जी सकती रानी, आइना देखती रितु, जैसे कितने दिनों से बीमार, आंखे सुजी हुई, चेहरे विरह वेदना का पीड़ा लिए.., पोरू को देख ले एक बार..बातें कर ले तो शायद तकलीफें दूर हो..।हाथों को छूकर देखती है तो हाथ बर्फ सामान ठंडा, लेकिन सिरदर्द से फटा जाए, ललाट पर नसों की रेखाएं दिखती..दिल और दिमाग में कई सवाल। वह सोच नहीं पाई कि आखिर ऐसा क्यों! उसका अपना चेहरा कहीं खो गया था। उसे समझा नहीं आया इस पंचतत्व (शरीर) में वह खुद है या पोरू। वह खुद को भूल गई.. उसे याद था तो पोरू का चेहरा। अचानक उसकी पलकें झपकते उस पल को याद करती जो उसकी जीवनधारा को बदल दी थी..वरना वो वैसी ही थी जैसे भीड़ में सब एक जैसे होते है। पत्थर हुए मन में न कोई धवनि थी न ही काई संचार। उसके भीतर मिलों दूर फैले रेत के कतार थे सिर्फ उसकी तपिश झुलसती थी..। रानी उसकी सिर का मालिश करती हुई कहती है इस तरह कैसे जिंदा रहोंगी..। फोन करो..। मोबाइल पर पोरू का उत्तर सो जाओ अभी व्यस्त हूं, थोड़ी देर बाद फोन करना..। रूखे उत्तर से रितु सन्न रह जाती है और उसके आंखों में भर जाते। ऐसा नहीं था कितना पत्थर दिल हो गया। नहीं-नहीं कोई मजबूरी होगी, तभी ऐसी बात कहीं, मुझे मिलते बातें करते ही जीवन का धारा बदल जाती है, जब मेरा हौंसला अफजाई करता है। रितु अतीत को देख सोचती है..काश! हम कभी नहीं मिले होते..ऐसी जिंदगी जो पल-पल उसकी यादों को झकझोरती है, उसे बार-बार वही पल याद आती है जब उसके रातों में चौकीदार की सिटियों के बीच बातें होती थी। आखिर उसकी बातों में क्या था कि उसको देख अचरच रह गई। मैडम आपका सबको बीच मुस्कराना और आप औरों से अलग है, जिस पर मैं तो क्या तो सभी फिदा है। ऐसी सादगी वाली लड़की जिसकी हर अंदाज अलग हो, वह जिसकी जिंदगी में आए उसकी जिंदगी सवर जाएं..काश! उसकी अधिकारपूर्ण वाक्य उसके मन में भर गया..आखिर वह लड़का ..? लगा इसे तो बरसो से पहचानती हूं, दुनिया की भीड़ में मैं..वह औरों से अलग..? ये शायद कोई नहीं जानता पर ऐसा पहली बार हुआ किसी की बातें दिल को छू लिया.. हमेश के लिए। वह सोच में पड़ गई। आखिर क्यों कर रही है..। फिर तो नहीं चाहती हुए उसका मन भटकने लगा और उसने पाया वह भी परेशान है उसी तरह..। पोरू पर कुछ जिम्मेदारियां हैं, वह काम में डूबा रहता है..। रितु को कभी-कभी लगता है कि वह बदल गया.वह सोचने लगती है। रितु रानी को देख परेशान हुई। वह पोरू का नंबर मिलाने लगी, लेकिन रितु ने मना कर दिया। पर वह कहां मानने वाली थी उसको अपने दोस्त की चिंता थी। रानी ने मैसेज भेज ही दिया, पर उसका फोन नहीं आया। खीझ उठी रानी, देखो पोरू को तुमसे कोई मतलब नहीं है..तुम पागल हो, जो उसके लिए मरती हो। रानी अपने काम में लग गई। रानी बड़बड़ाई आखिर क्यों चाहती है पत्थर दिल इंसान को इस हद तक..। जिसे तुम्हारी परवाह नहीं। रितु जैसी भावुक लड़की दूसरों का कुछ नहीं पर अपनी जिंदगी बर्बाद कर लेती है, उसे प्रेम के दो शब्द में स्वार्थ और बेकूफी नजर आने लगे। पर रितु को यकीन था...दूसरे दिन पोरू फोन कर उसको समझाने लगा। मेरे फोन न करने की मजबुरी थी। पोरू रितु को दिलोंजान से चाहता था, आखिर मजबुरी में उसको बताना पड़ा। उसे डर था रितु की आंसुओं को रोक नहीं पाएगा, इसलिए उसने कुछ समय को विराम दे दिया..। मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती पोरू। रितु के आंसू सावन भादो की वर्षा की बरस पड़ी। जानता हूं.., महसूस करता हूं, तुम्हें हर पल अपने भीतर। पर तुम मेरी कमजोरी नहीं शक्ति रितु..यह एहसास उसकी जिंदगी में सुखद हो गया और उसने न रोने का वादा किया। उन दोनों को नहीं मालूम की उसका साथ जिंदगी भर का है या नहीं। पर तसल्ली है कि स"ा प्रेम करने वाला कोई ह,ै जो दिल से एक-दूसरे को एहसास करता है। उनकी प्रेम की गहराई और ऊंचाई भापना हद से बाहर थी। रानी ने कहा, पीड़ा और सुख के बीच वह मिठास था..जो आंखों से झलकता है..।
कहते हैं न...
यह इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजिए
एक आग का दरिया है और डूब कर जाना है..।

Saturday, December 20, 2008

बचपन

वह पिपल की छांव, खुली आकाश में हमारा बचपन
वह बलखाती सी हवाएं, अमृत सा धूप
जिस पर कुर्बान थी हमारी बचपन की शरारतें
आज तड़पाती है बचपन की नदानी भरी शरारतें
गर्मी की छुट्टी में गांव जाना
हरियाली की छांव तले रहना
फूलों से घिरी लताएं के बीच महलों में रहना
आसपास फल-फूलों से भरी बगीचों में रंग-बिरंगे तितलियों का आना
और भौंरो का गुनगुनाना
इस कोमल मन में तंरग भर जाता था
ज्येष्ठ की दोपहर में दौड़-दौड़ कर बगीचों में जाना
जिस पर बड़ों का डांट पड़ना
आज तड़पाती है बचपन की नदानी भरी शरारतें
एक अपार शांमिमयी सुबह शाम थी
न साजिश न जज्बातों की टक्कर थी
हर जगह सुनहरी ख्याबों से भरी दुनिया थी
जब पड़ा उग्र का लंगर तब फिजा वही थी
सिर्फ हवाएं की रुख बदली थी
आज तड़पाती है बचपन की नदानी भरी शरारतें
उतर चुका है, फिर भी आकाश में रोशनी है
ढल चुका है बचपन, युवा हो मन में आज भी कही बचपन है
इसलिए आज भी तड़पाती है बचपन की नदानी भरी शरारतें

Sunday, December 7, 2008

बातों की अनकही..


बातों की अनकही कोई क्या जाने,न भी जाने तो क्या जाने, जाने भी तो क्या जाने, बातों का छलावा तो बहुत करते है, कोई खुद उस छलावा को जाने तो समझे,ख्वाबों के टूटने का गम नहीं, जितनी बातों के बदले का होता है, दर्द तो ख्वाबों के टूटने का भी होता है, पर उस दर्द का क्या जो बन जाता किसी का फसाना, दिन बितते गए रात ढलती रही पर न बदला तो उसका.., गलती उसकी नहीं गलती उस वक्त की जो किसी के विश्वास और भावनाओं को बांध नहीं पाया। समझते दोनों थे पर जज्बातों का उल्लेख करूं क्या...!

Tuesday, November 18, 2008

राजनैतिक पर लक्ष्मी जी की अपार माया


आज कि युग में लक्ष्मीजी की माया आपार है। हमारे प्राचीन ग्रन्थों में लिखा है के वे यदि खुश हो जाए तो दुखीराम सुखीराम हो जाए और गंगूतेली भोजराज। मगर इस घोर कलियुग में इन पुराण कथाओं पर लोगों का विश्वास कहां। वे तो अपनी आंखों से सारा चमत्कार देखना चाहते है। लक्ष्मी जी भी कहां चूकने वाली थी वे बोली 'हाथ कंगन को आरसी क्या' उन्होंने छाट-छाटकर लोगों को गदिदयों पर बैठाना शुरू कर दिया। इन छटे-छटाए लोगों के गद्दी पर बैठते ही चाल-ढाल बदल गए। खुदा जब हुस्न देता है तो नजाकत आ जाती है। घोड़ा-गाड़ी, बगला, नौकर-चाकर, हाथ में सत्ता और अंदर माया की बहती नदी मिली नहीं कि करेला नीम पर चढ़ गया। देखते ही देखते गद्दीधायिों की काया कचौरियों की तरह फूलने लगी। गृहणियां गुबारे और बच्चे फूटबाल की तरह फूल गए। नामी बेनामी खाते बैंकों में खुले जायदादे बने, हवाई उड़ाने उड़ी और कल कर कलवा आल का कालूराम हो गया। चारों तरफ माया फैल गई तो आदमी को आदमी समझने की आवश्यकता उन्हें कैसी रहती? जो कह दिया वह कानून, जो कर दिया वह न्याय। लोग करते भी क्या? चुप्पी साधे गए क्योंकि वे जानते थे कि मुंह खुला तो बिके बारह के भाव। कहां फंसवा दिया, कहां फिकवा दे कोई नहीं जानता। महालक्ष्मीजी की कृपा से उनके चारों ओर सुख-शांति की नदी बह रही थाी। खुशीराम उनकी जय जयकार करते नहीं थकते। नतीजा यह हुआ कि उनके साथ-साथ उनके सगे संबंधी, चमचे-तमचे आदि उसी तरह दिन-दुनी रात चौंगुनी तरक्की करने लगे। जैसे खेती के साथ खरपतवार। एक स्थिति तो यह भी आई कि माया को कैसे समेटे, कहां रखे? जगह नहीं मिली तो प्रेमिकाओं को कोठियां बनकर दी, उनके तलघरों में माया छुपाई, बेनामी सौदे में खफाई। मगर बाहरी लक्ष्मी तुम्हारी माया छिपाए न छिपे। लाकर, तहखाने सब गले-गले तक मारे गए। इन गद्दीधारियों की चहुमुखाी प्रगति देखकर पूरे देश में गद्दी हथियाने की होड़ लग गई। रातोंरात चोर उच्चके, दस-नंबरीयों, तस्कर गैंगबाज हो गए। जनता के चरणों में लोटने लगे, भाग्य विधाताओं एक बार हमें भी लोटने का मौका दो और देखो हम आपको आसमान के तारे तोड़कर न दे तो हमारा नाम बदल देना। बेचारी भोली भाली जनता झांसे में आ गई और कई बगुलों को कंधों पर उठाकर गद्दी पर बिठा दिया। बस यही तो चाहिए था। सत्ता हाथ में आते ही लगे दोनों हाथों माया से खेलने। अभी तक दूध में पानी, आटे में नमक सब चल रहा था मगर उन्होंने आते ही उल्टी गंगा बहा दी। पानी में दूध और नमक में आटा मिलाया। किसी ने शिकायत की तो मजा चखवा दिया। सिमेंट की जगह रेट के पुल, बांध, सड़के और इमारतें बनने लगी। नतीजे सामने आने लगे तो पढ़-पढ़ाए आयोग बिठा दिया और उन्हें लीपा-पोती करने का पट्टा दे दिया। जब पानी सिर से ऊपर हो गया तो कुछ बेचारे गरीब लोगों ने गुहार लगाई। महालक्ष्मी जी ये क्या करवा रही हो? हमारे शरीर पर अब केवल चमड़ी बची है, अब तो हम पर रहम करो। वे भोली बनकर बोली क्या हुआ भक्तजनों? भक्तजनों ने जबाव दिया- मां, गद्दीधारीयों एक भंयकर रोग से पीड़ित है 'रोग का नाम है खाओ-खाओ रोग'। गद्दीधारियों की भूख इतनी बढ़ गई है कि वे रेल, पुल, सड़क, बांध, भवन, पशुचारा, मशीनें, टेलीफोन खंभे, हवा, कपड़ा और पानी के जहाज जमीन जायजाद सहित सबकुछ खाने पर आमद है। फिर भी उनकी भूख नहीं मिट रही। रिश्वत दलाली, नजराना, शुक्रराना तो पुरानी पंरपरा थी ही अब तो ऐसा लग रहा है कि चारों दिशाओं से गद्दीधारी लोग देश को खाने पर उतारू है। सोचो लक्ष्मी मां, उत्तर में हिमालय और कश्मीर, दक्षिण में केरल और तमिलनाडू, पूर्व में बंगाल और उड़ीसा और वश्चिम में गुजरात महाराष्ट्र को खाने के लिए लोग टूट पड़े तो इस देश को नष्ट होने में कितनी देर लगेगा। लक्ष्मीजी आंख बंद की तो उनके माथे पर चिंता की लकीर उभर आई। वे आधे सेंटीमीटी मुस्कराई और बोली अच्छा मिली बिल्ली मुझे ही म्याऊ। मुझे ही खाने पर उतर आए मेरे बनाए लोग? ठीक है लो मेरी अब यह माया भी देखो। सारे गरीब भुखमरे भौंचक्के होकर लक्ष्मीजी की माया देखने लगे। लक्ष्मी जी ने रातोंरात लोगों में ऐसी चेतना लगाई की वे गिन-गिनकर इन खाओ-खाओ रागे से पीड़ित गद्दीधारियों को गद्दी से खींचकी सड़क पर पटकने लगी। कुछ ने हिम्मत करके उनका कच्चा-चिट्टा जुटाया और पुलिस के हवाले कर दिया। कमाल है जो पुलिस कल तक अंधे, बहरे, गंगू का रोल कर रहे थी वह एकदम डंडा उठाकर इन आरोपियों पर उठ पड़ी और सबको हवालात में बंद कर कानून के हवाले कर दिया। लक्ष्मी जी की माया से न्यायालय भी चैतन्य हो गए और गिन-गिनकर उन सबको जेल में बंद करवा दिया। बड़े-बड़े धुरधरों को जेलों में चटाई पर सोते और खटमलों, मच्छरों से सम्मेलनों की अध्यक्षता करते हुए देखकर लक्ष्मीजी भाव-विभोर हो रही थी। पूरे देश में हड़कंप मंच गया। अभूतपूर्व लोग भूतपूर्व लोग और वर्तमान महान लोग धूल धूसरित हो गए। बेचारी जनता आंखें फाड़-फाड़कर उनके काले करनामें अखबारों और टेलीविजन में देखकर भौंचक्के हो रही थी। ऐसे यह आलकल राजनैतिक पर लक्ष्मीजी का अपार माया।

Sunday, October 26, 2008

शुभ दीवाली


दीवाली आने को है और मौसम का रूख बदला है। कहीं खुशी है तो कही गम है। दुकानों में दीये, तोरण, लक्ष्मी-गणेश, बर्तन और मेवे के सजावटी डिब्बों की भरमार है। बाजारों की उठा-पटक के बाद हर ओर एक आशा कि किरण है कि शायद फिर वही रौनक आएगी। कहीं लाठियों की मार है, जो कहीं मंदी की मार। त्योहारों में घर जाने को बेताब लोग स्टेशनों पर गाडि़यों के इंतजार में है। दीये की रोशनी की तरह दिल में आस जगाए है। उमंग और उत्साह के साथ घर पर दीप जलाएंगे।

Wednesday, October 8, 2008

गांगुली के कैरियर का घटनाक्रम


जनवरी 1992- वेस्टइंडीज के खिलाफ ब्रिस्बेन में एकदिवसीय क्रिकेट में पदार्पण। तीन रन बनाकर आउट। टीम से बाहर। जून 1996- इंग्लैंड के खिलाफ ला‌र्ड्स में पदार्पण टेस्ट में ही शतक जमाया। ट्रेंट ब्रिज में अगले टेस्ट मैच में भी शतक जमाया। अगस्त 1997- कोलंबो में श्रीलंका के खिलाफ एकदिवसीय मैचों में अपना पहला शतक जमाया। सितंबर 1997- पाकिस्तान के खिलाफ सहारा कप में भारत की 4-1 से जीत में सर्वाधिक रन बनाने और विकेट लेने वाले खिलाड़ी। गांगुली ने 55.5 की औसत से 222 रन और 10.66 की औसत से 15 विकेट लिए। उन्हें चार मैच में मैन आफ द मैच और मैन आफ द सीरीज चुना गया।नवंबर-दिसंबर 1997- श्रीलंका के खिलाफ तीन मैचों की घरेलू श्रृंखला में मैन आफ द सीरीज। उन्होंने 98.00 की औसत से 392 रन बनाए।मई 1999- श्रीलंका के खिलाफ विश्व कप मैच में टांटन में 183 रन बनाए, जो उस समय एकदिवसीय मैचों में किसी भारतीय का सर्वाधिक स्कोर था। सितंबर 1999- सचिन तेंदुलकर के चोटिल होने के कारण हटने से सिंगापुर चैलेंज में पहली बार एकदिवसीय मैचों में भारत की कप्तानी की।फरवरी 2000- लंकाशर से जुड़े। फरवरी 2000- तेंदुलकर के इस्तीफे के बाद दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ पांच वन डे मैचों की श्रृंखला के लिए कप्तान नियुक्त। मार्च 2001- भारत को आस्ट्रेलिया पर अपनी सरजमीं में 2-1 से ऐतिहासिक जीत दिलाई। नवंबर 2001- गांगुली और पांच अन्य भारतीयों को पोर्ट एलिजाबेथ टेस्ट के दौरान मैच रेफरी माइक डेनेस ने अधिक अपील करने के लिए आगाह किया। एक टेस्ट मैच और पांच एकदिवसीय मैचों का निलंबित प्रतिबंध लगाया। जुलाई 2002- भारत की नेटवेस्ट सीरीज फाइनल में जीत के बाद ला‌र्ड्स की बालकनी में शर्ट निकालकर लहराई।मार्च 2003- भारतीय टीम को विश्व कप फाइनल तक पहुंचाया। अप्रैल 2004- पाकिस्तान में टेस्ट श्रृंखला जीतने वाले पहले भारतीय कप्तान बने। इसके साथ ही 15 टेस्ट जीत के साथ भारत के सबसे सफल कप्तान बने।अक्टूबर 2004- भारत ने 35 साल बाद आस्ट्रेलिया से घरेलू श्रृंखला गंवाई।मार्च 2005- पाकिस्तान के खिलाफ घरेलू श्रृंखला ड्रा करवाई। अप्रैल 2005- पाकिस्तान के खिलाफ एकदिवसीय श्रृंखला के दौरान धीमी ओवर गति के लिए छह मैच का प्रतिबंध। भारत श्रृंखला 2-4 से हारा।सितंबर 2005- जिम्बाब्वे में खुलासा किया कि कोच ग्रेग चैपल ने उनसे कप्तानी छोड़ने के लिए कहा था।नवंबर 2005- टेस्ट कप्तानी के पांच साल के कार्यकाल का अंत। राहुल द्रविड़ नए कप्तान बने। जनवरी 2006- पाकिस्तान के खिलाफ टेस्ट श्रृंखला के लिए चुने गए।दिसंबर 2006- दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टेस्ट श्रृंखला में वापसी। सर्वाधिक रन बनाने वाले बल्लेबाज।जनवरी 2006- एकदिवसीय मैचों में वापसी। वेस्टइंडीज के खिलाफ पहले मैच में ही 98 रन बनाए।जुलाई अगस्त 2007- इंग्लैंड के खिलाफ भारत की जीत में 49.80 की औसत से 249 रन बनाए। नवंबर दिसंबर 2007- पाकिस्तान के खिलाफ तीन टेस्ट मैचों की श्रृंखला में सर्वाधिक 534 रन बनाये। मैन आफ द सीरीज बने। पहली बार अपने घरेलू मैदान ईडन गार्डन्स पर शतक जड़ा। बेंगलूर में अगले मैच में पहला दोहरा शतक बनाया। दिसंबर 2007 से जनवरी 2008- आस्ट्रेलिया के खिलाफ मिश्रित सफलता। दो अर्धशतक 29.37 की औसत से रन बनाए। एकदिवसीय टीम से बाहर। अक्टूबर 2008- आस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट श्रृंखला के बाद संन्यास लेने की घोषणा की।

Monday, September 29, 2008

गाता रहे मेरा दिल...


अगर किसी पूजा घर में जलते दिये की रोशनी और घंटियों की पवित्र आवाज को मिलाकर इंसानी सूरत में बदला जाए, तो शायद वह कुछ-कुछ लता मंगेशकर की सी तस्वीर होगी। वही लता, जिसके बारे में एक दफा उस्ताद बड़े गुलामअली खां ने कहा था कि क म्बख्त कभी गलती से भी बेसुरा नहीं गाती। लगभग छह दशकों से अपनी दिलकश आवाज से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाली संगीत की देवी हेमा हरिदकर उर्फ लता मंगेश्कर के गीत आज भी श्रोताओं को बरबस अपनी ओर आकर्षित करते हैं जिसे सुनकर सबों के दिल से यही आवाज आती है गाता रहे तेरा दिल..। लता मंगेश्कर के पिता पंडित दीनानाथ मंगेश्कर मराठी रंगमंच से जुड़े हुए थे। पांच वर्ष की उम्र मे लता ने अपने पिता के साथ नाटकोंमे अभिनय शुरू कर दिया और इसके साथ ही वह संगीत की शिक्षा अपने पिता से लेने लगी। 28 सिंतबर 1929 को मध्यप्रदेश में इंदौर शहर के एक मध्यम वर्गीय मराठी परिवार मे जन्मी लता ने वर्ष 1942 मे किटी हसाल..के लिए अपना पहला गाना गाया, लेकिन उनके पिता दीनानाथ मंगेश्कर कोलता का फिल्मों के लिए गाना पसंद नहीं आया और उन्होंने उस फिल्म से लता के गाए गीत को हटवा दिया। वर्ष 1942 मे तेरह वर्ष की छोटी उम्र में ही लता के सिर से पिता का साया मे उठ गया और परिवार की जिम्मेदारी उनके उपर आ गई। इसके बाद उनका पूरा परिवार पूणो से मुंबई आ गया। हालांकि लता को फिल्मों मे अभिनय करना जरा भी पसंद नही था बावजूद इसके परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी को उठाते हुए उन्होंने फिल्मों मे अभिनय करना शुरूकर दिया। वर्ष 1942 मे लता को पहली मंगलगौर..में अभिनय करने का मौका मिला। वर्ष 1945 में लता की मुलाकात संगीतकार गुलाम हैदर से हुई। गुलाम हैदर लता के गाने के अंदाज से काफी प्रभावित हुए और उन्होंने फिल्म निर्माता एस. मुखर्जी से यह गुजारिश की कि वह लता को अपनी फिल्म शहीद में गाने का मौका दे। मुखर्जी को उनकी आवाज पसंद नहीं आई और उन्होंने लता को अपनी फिल्म में लेने से इंकार कर दिया। इस बात को लेकर गुलाम हैदर काफी गुस्सा हुए और उन्होंने कहा यह लड़की आगे इतना अधिक नाम करेगी कि बड़े-बड़े निर्माता-निर्देशक उसे अपनी फिल्मों में गाने के लिए गुजारिश करेंगे। वर्ष 1949 में फिल्म महल के गाने आयेगा आने वाला.. गाने के बाद लता बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गई। इसके बाद राजकपूर की बरसात के गाने जिया बेकरार है.., हवा में उड़ता जाए..जैसे गीत गाने के बाद लता मंगेश्कर बॉलीवुड में एक सफल पाश्र्वगायिका के रूप मे स्थापित हो गई। पचास के दशक में गुलाम हैदर की कही गई बात सच निकली और लता मंगेश्कर, शंकर जयकिशन, एस.डी.बर्मन, सी.रामचंदर्् मदन मोहन, हेमन्त कुमार और सलिल चौधरी जैसे नामी-गिरामी संगीतकारों की चहेती गायिका बन गई। साहिर लुधियानवी के लिखे गीत और एस.डी. बर्मन के संगीत निर्देशन मे लता ने कई हिट गाने गाए। साहिर लुधियानवी के रचित गीत पर लता ने वर्ष 1961 में फिल्म हमदोनों के लिए अल्लाह तेरो नाम..भजन गाया जो लोगों मे काफी लोकप्रिय हुआ था।हिंदी सिनेमा के शो मैन कहे जाने वाले राजकपूर को सदा अपनी फिल्मों के लिए लता मंगेश्कर की आवाज की जरूरत रहती थी। राजकपूर लता की आवाज के इस कदर प्रभावित थे कि उन्होंने लता मंगेश्कर को सरस्वती का दर्जा तक दे रखा था। साठ के दशक में लता मंगेश्कर बॉलीवुड में पाश्र्वगायिकाओं की महारानी कही जाने लगी। लता की आवाज से नौशाद का संगीत सज उठता था। संगीतकार नौशाद लता के आवाज के इस कदर दीवाने थे कि उन्होंने अपनी हर फिल्म के लिए लता को ही ंिलया करते थे। वर्ष 1960 में प्रदर्शित फिल्म मुगले आजम के गीत मोहे पनघट पे गीत की रिकार्डिंग के दौरान नौशाद ने लता से कहा था मैने यह गीत केवल तुम्हारे लिए ही बनाया है इस गीत को कोई और नहीं गा सकता है। वर्ष 1969 में लक्ष्मीकांत प्यारे लाल के संगीत निर्देशन में लता ने फिल्म इंतकाम का गाना आ जानें जा..गाकर यह साबित कर दिया कि वह आशा भोंसले की तरह पाश्चात्य धुन पर भी गा सकती हैं। वर्ष 1976 मे ख्ययाम के संगीत निर्देशन में लता मंगेश्कर ने फिल्म के लिए कभी-कभी मेरे दिल मे ख्याल आता है.. गाना गाया, जो आज भी हिंदी सिनेमा के कलात्मक गानों मे शुमार किया जाता है। लता मंगेश्कर को उनके गाए गीत के लिए चार बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। लता मंगेश्कर को सबसे पहले वर्ष 1958 मे प्रदर्शित फिल्म मधुमती के आजा रे परदेसी.. गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायिका का फिल्म फेयर पुरस्कार दिया गया था। इसके बाद वर्ष 1962 मे फिल्म बीस साल बाद के गाने कहीं दीप जले कहीं दिल.. वर्ष 1965 मे फिल्म खानदान के तुम्ही मेरे मंदिर तुम्ही मेरी पूजा.. और वर्ष 1969 मे फिल्म जीने की राह के गाने आप मुझे अ''छे लगने लगे..के लिए भी लता मंगेश्कर फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित की गई। इसके अलावा वर्ष 1993 में उन्हें फिल्म फेयर का लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड भी दिया गया। इसके साथ ही वर्ष 1994 में लता मंगेश्कर फिल्म हम आपके हैं कौन के गाने दीदी तेरा देवर दीवाना.. गाने के लिये फिल्म फेयर के विशेष पुरस्कार से सम्मानित की गई। लता मंगेश्कर को उनके गाए गीत वर्ष 1972 में फिल्म परिचय, वर्ष 1975 में कोराकागज और वर्ष 1990 में फिल्म के लिए नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया गया। इसके अलावा लता मंगेश्कर को वर्ष 1969 में पदमभूषण, वर्ष 1989 में दादा साहब फाल्के सम्मान, 1997 में राजीव गांधी सम्मान, 1999 में पदमविभूषण, वर्ष 2001 में भारत रत्न जैसे कई सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।
गाता रहे मेरा दिल..अगर किसी पूजा घर में जलते दिये की रोशनी और घंटियों की पवित्र आवाज को मिलाकर इंसानी सूरत में बदला जाए, तो शायद वह कुछ-कुछ लता मंगेशकर की सी तस्वीर होगी। वही लता, जिसके बारे में एक दफा उस्ताद बड़े गुलामअली खां ने कहा था कि क म्बख्त कभी गलती से भी बेसुरा नहीं गाती। लगभग छह दशकों से अपनी दिलकश आवाज से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाली संगीत की देवी हेमा हरिदकर उर्फ लता मंगेश्कर के गीत आज भी श्रोताओं को बरबस अपनी ओर आकर्षित करते हैं जिसे सुनकर सबों के दिल से यही आवाज आती है गाता रहे तेरा दिल..। लता मंगेश्कर के पिता पंडित दीनानाथ मंगेश्कर मराठी रंगमंच से जुड़े हुए थे। पांच वर्ष की उम्र मे लता ने अपने पिता के साथ नाटकोंमे अभिनय शुरू कर दिया और इसके साथ ही वह संगीत की शिक्षा अपने पिता से लेने लगी। 28 सिंतबर 1929 को मध्यप्रदेश में इंदौर शहर के एक मध्यम वर्गीय मराठी परिवार मे जन्मी लता ने वर्ष 1942 मे किटी हसाल..के लिए अपना पहला गाना गाया, लेकिन उनके पिता दीनानाथ मंगेश्कर कोलता का फिल्मों के लिए गाना पसंद नहीं आया और उन्होंने उस फिल्म से लता के गाए गीत को हटवा दिया। वर्ष 1942 मे तेरह वर्ष की छोटी उम्र में ही लता के सिर से पिता का साया मे उठ गया और परिवार की जिम्मेदारी उनके उपर आ गई। इसके बाद उनका पूरा परिवार पूणो से मुंबई आ गया। हालांकि लता को फिल्मों मे अभिनय करना जरा भी पसंद नही था बावजूद इसके परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी को उठाते हुए उन्होंने फिल्मों मे अभिनय करना शुरूकर दिया। वर्ष 1942 मे लता को पहली मंगलगौर..में अभिनय करने का मौका मिला। वर्ष 1945 में लता की मुलाकात संगीतकार गुलाम हैदर से हुई। गुलाम हैदर लता के गाने के अंदाज से काफी प्रभावित हुए और उन्होंने फिल्म निर्माता एस. मुखर्जी से यह गुजारिश की कि वह लता को अपनी फिल्म शहीद में गाने का मौका दे। मुखर्जी को उनकी आवाज पसंद नहीं आई और उन्होंने लता को अपनी फिल्म में लेने से इंकार कर दिया। इस बात को लेकर गुलाम हैदर काफी गुस्सा हुए और उन्होंने कहा यह लड़की आगे इतना अधिक नाम करेगी कि बड़े-बड़े निर्माता-निर्देशक उसे अपनी फिल्मों में गाने के लिए गुजारिश करेंगे। वर्ष 1949 में फिल्म महल के गाने आयेगा आने वाला.. गाने के बाद लता बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गई। इसके बाद राजकपूर की बरसात के गाने जिया बेकरार है.., हवा में उड़ता जाए..जैसे गीत गाने के बाद लता मंगेश्कर बॉलीवुड में एक सफल पाश्र्वगायिका के रूप मे स्थापित हो गई। पचास के दशक में गुलाम हैदर की कही गई बात सच निकली और लता मंगेश्कर, शंकर जयकिशन, एस.डी.बर्मन, सी.रामचंदर्् मदन मोहन, हेमन्त कुमार और सलिल चौधरी जैसे नामी-गिरामी संगीतकारों की चहेती गायिका बन गई। साहिर लुधियानवी के लिखे गीत और एस.डी. बर्मन के संगीत निर्देशन मे लता ने कई हिट गाने गाए। साहिर लुधियानवी के रचित गीत पर लता ने वर्ष 1961 में फिल्म हमदोनों के लिए अल्लाह तेरो नाम..भजन गाया जो लोगों मे काफी लोकप्रिय हुआ था।हिंदी सिनेमा के शो मैन कहे जाने वाले राजकपूर को सदा अपनी फिल्मों के लिए लता मंगेश्कर की आवाज की जरूरत रहती थी। राजकपूर लता की आवाज के इस कदर प्रभावित थे कि उन्होंने लता मंगेश्कर को सरस्वती का दर्जा तक दे रखा था। साठ के दशक में लता मंगेश्कर बॉलीवुड में पाश्र्वगायिकाओं की महारानी कही जाने लगी। लता की आवाज से नौशाद का संगीत सज उठता था। संगीतकार नौशाद लता के आवाज के इस कदर दीवाने थे कि उन्होंने अपनी हर फिल्म के लिए लता को ही ंिलया करते थे। वर्ष 1960 में प्रदर्शित फिल्म मुगले आजम के गीत मोहे पनघट पे गीत की रिकार्डिंग के दौरान नौशाद ने लता से कहा था मैने यह गीत केवल तुम्हारे लिए ही बनाया है इस गीत को कोई और नहीं गा सकता है। वर्ष 1969 में लक्ष्मीकांत प्यारे लाल के संगीत निर्देशन में लता ने फिल्म इंतकाम का गाना आ जानें जा..गाकर यह साबित कर दिया कि वह आशा भोंसले की तरह पाश्चात्य धुन पर भी गा सकती हैं। वर्ष 1976 मे ख्ययाम के संगीत निर्देशन में लता मंगेश्कर ने फिल्म के लिए कभी-कभी मेरे दिल मे ख्याल आता है.. गाना गाया, जो आज भी हिंदी सिनेमा के कलात्मक गानों मे शुमार किया जाता है। लता मंगेश्कर को उनके गाए गीत के लिए चार बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। लता मंगेश्कर को सबसे पहले वर्ष 1958 मे प्रदर्शित फिल्म मधुमती के आजा रे परदेसी.. गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायिका का फिल्म फेयर पुरस्कार दिया गया था। इसके बाद वर्ष 1962 मे फिल्म बीस साल बाद के गाने कहीं दीप जले कहीं दिल.. वर्ष 1965 मे फिल्म खानदान के तुम्ही मेरे मंदिर तुम्ही मेरी पूजा.. और वर्ष 1969 मे फिल्म जीने की राह के गाने आप मुझे अ''छे लगने लगे..के लिए भी लता मंगेश्कर फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित की गई। इसके अलावा वर्ष 1993 में उन्हें फिल्म फेयर का लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड भी दिया गया। इसके साथ ही वर्ष 1994 में लता मंगेश्कर फिल्म हम आपके हैं कौन के गाने दीदी तेरा देवर दीवाना.. गाने के लिये फिल्म फेयर के विशेष पुरस्कार से सम्मानित की गई। लता मंगेश्कर को उनके गाए गीत वर्ष 1972 में फिल्म परिचय, वर्ष 1975 में कोराकागज और वर्ष 1990 में फिल्म के लिए नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया गया। इसके अलावा लता मंगेश्कर को वर्ष 1969 में पदमभूषण, वर्ष 1989 में दादा साहब फाल्के सम्मान, 1997 में राजीव गांधी सम्मान, 1999 में पदमविभूषण, वर्ष 2001 में भारत रत्न जैसे कई सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।

Saturday, September 13, 2008

सेल


चकचौंध भरी रौशनी में दुनिया को दिखाती नही

स्वत्रंत राज में इन्सान इन्सान के खून से नहाता है

लाशो के ढेर पर खरी है इंसानियत

बाजारों में सेल के भाव बिकती है

इस देश में वफादारी की कसौटी पर संदेह देखती है

अब तो लोकतंत्र की मन्दिर में भी सेल लगने लगी है

Sunday, September 7, 2008

किनारे की तलाश में भटकती जिंदगी



भूख से तड़प रही जिंदगी
किसी का आसियाना खो गया
तो किसी का अपना खो गया।


बिहार में कोसी नदी में आयी प्रलयंकारी बाढ़ फिल्मी नहीं है, लेकिन इसने कई ऐसी त्रासद कहानियां छोड़ी हैं जो फिल्मों में ही दिखती हैं कि पानी के प्रवाह में पूरा का पूरा हंसता खेलता परिवार बिखर जाए और फिर एक-दूसरे को ढूंढता फिरे। बिहार में कोसी नदी से आई बाढ़ ने जहां लोगों को घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया है, वहीं संकट की इस घड़ी में मानवता के धर्म के चलते सभी मजहबी दीवारें भी ढह गई हैं। भारतीय परंपरा में नदियां जीवन दायिनी मानी जाती हैं। मां भी जीवन देती है, लेकिन बिहार के लिए शाप बन चुकी कोसी में आयी प्रलयंकारी बाढ़ में सबकुछ गंवाने वाली एक मां रेलवे स्टेशन पर बिलख रही है। क्योंकि अपने दुधमुंहे को पिलाने के लिए उसके आंचल में दूध नहीं उतर रहा है। प्राकृतिक आपदा में लोगों के सिर ढांपने की जगह बने पूर्णिया रेलवे स्टेशन पर शरण लिए झुनकी अपने चार महीने के दुघमुंहे ब'चे को गोद में लिए बिलख रही है। पिछले कई दिनों से बाढ़ में फंसे रहने और भूखे रहने के कारण उसकी इतनी साम‌र्थ्य नहीं बची कि भूख से तड़प रहे रोते बिलखते अपने ब'चे को स्तनपान कराकर उसकी पेट की आग बुझा सके। झुनकी के साथ आयी मधेपुरा जिले के सौर बाजार की रहने वाली उसकी पड़ोसन अहल्या उसे रोता देख ढांढस बंधाने का प्रयास करती है, लेकिन आंसू हैं कि थमते ही नहीं। थमे भी कैसे। ब'चा भूखा है।सहरसा जिले में खाकी पैंट पहने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यकर्ता अपने बाढ़ पीडि़त रोजेदार मुस्लिम भाइयों को पवित्र महीने रमजान में इफ्तार करा रहे हैं। यह नजारा सहरसा के जिला स्कूल परिसर में संघ परिवार के एक घटक सेवा भारती द्वारा चलाए जा रहे एक राहत शिविर का है। यहां रमजान में रोजा रखने वाले मुस्लिम समुदाय के लगभग 100 लोगों को आरएसएस के कार्यकर्ता अजान होते ही मुढी और घुधनी परोस कर उन्हें रोजा इफ्तार करा रहे हैं। मधेपुरा जिले के परमा गांव निवासी मो. सलाउद्दीन राहत शिविर में अपने परिवार के साथ एक सप्ताह से यहां शरण लिए है। उनके साथ कोई भेदभाव नहीं बरता गया। ऐसा ही कुछ नजारा मधेपुरा स्थित एक मुस्लिम मदरसा के छात्रावास का भी है, जहां कुमारखंड और मुरलीगंज के विभिन्न इलाकों से अपनी जान बचाकर आए साठ से अधिक साधु शरण लिए हुए हैं। इन्हें यहां के मुस्लिम शिक्षक और छात्रों द्वारा न केवल उनके आवास और भोजन की व्यवस्था की गई है, बल्कि उन्हें यहां पूजा पाठ करने के लिए उन्होंने एक खास स्थान भी दे रखा है। मधेपुरा स्थित मदरसा के छात्रवास में शरण लिए साधु महेन्द्र साह को छात्रावास में किसी तरह की कोई कठिनाई नहीं है। पूर्णिया जिले के भनगाहा निवासी सुप्रिया देवी भाग्यशाली नहीं रही और उसने बचाव कार्य मे लगे सेना के जवानों से हाथ जोड़ते हुए कहा कि वे बाढ़ में फंसे उसके पति और ब'चों को बचा लें। कोसी में आई इस प्रलयंकारी बाढ़ ने अमीर-गरीब सभी को एक जैसा बना दिया है। अब वे राहत शिविरों में एक साथ सोते और खाते पीते हैं। संकट के इस घड़ी में भी सबकुछ लुटा चुके ये लोग थोड़ी सी खुशी मिलने पर भी सारे गमों को भूलकर उसका आनंद उठाने में कोई संकोच नहीं करते। ऐसा ही माहौल सहरसा जिले के आर जे महिला कालेज परिसर में स्थित राहत शिविर में है, जहां रुपा नामक एक महिला ने एक ब'ची को जन्म दिया है और उसके छठी के अवसर पर महिलाएं एकत्रित होकर सोहर गीत गा रही हैं। ब'चे के जन्म पर सोहर गया जाता है। रुपा के पति सुरेन्द्र का कहना है कि वे अपनी इस बिटिया का नाम इसी नदी के नाम पर कोसी रखेंगे जिसने उनका सबकुछ तबाह और बर्बाद कर दिया है, ताकि कोसी मइया उन्हें भविष्य में और किसी विपदा में न डाले। कोसी प्रक्षेत्र के बाढ़ प्रभावित लोग तीन सौ किलोमीटर की यात्रा कर पटना रेलवे स्टेशन पहुंच रहे हैं और उनके आने से रेलवे स्टेशन पर एक बड़े राहत शिविर जैसा नजारा है। बाढ़ की स्थिति में कुछ सुधार आते ही इस जल प्रलय में एक-दूसरे से बिछड़े गए लोग अपनों की तलाश में एक राहत शिविर से दूसरे राहत शिविर का चक्कर लगा रहे हैं और उनकी आंखों में अब भी तबाही का खौफ तारी है। सुरक्षित ठिकानों की ओर भागने के क्रम में मधेपुरा जिले के बुधमा गांव निवासी सावित्री देवी पथराई आंखों से रेलवे स्टेशन बस अड्डा और विभिन्न राहत शिविरों में अपने पति और दो पुत्रियों को ढूंढती फिर रही हैं, जो जीवन बचाने के दौरान उनसे बिछड़ गऐ। बाढ़ त्रासदी से पूर्व संपन्न किसान रहे सुपौल जिले के जीवछपुर निवासी जगदीश भगत की भी ऐसी ही हालत है। वह भी अपने परिवार के सदस्यों की तलाश में इधर-उधर भटकते फिर रहे हैं। ये अपने बिछड़े परिजनों की तलाश में सुबह होते ही निकल पड़ते हैं और रात होने पर थक हार कर मायूस फिर अपने राहत शिविर में लौट आते हैं। पिछले कई दिनों से उनकी यही दिनचर्या है, लेकिन इसी आस में कि उनसे कहीं न कहीं मुलाकात हो ही जाएगी उनकी यह कोशिश जारी है।70 वर्षीय जगदीश भगत अपने गृह जिला से 75 किलोमीटर की दूरी पर फारबिसगंज में एक राहत शिविर में शरण लिए हुए हैं। घर से भागने के समय उनकी दो बहुएं और छह पौत्र पौत्रियां वहां छूट गई। भगत ने बताया कि वह अपने घर के बाहर थे तभी गांव में बाढ़ का पानी प्रवेश कर गया और देखते ही देखते पानी छाती तक पहुंच गया और अपनी जान बचाने के लिए वह एक पेड़ पर चढ़ गए। दो दिनों के बाद सेना की एक बोट की मदद से वे यहां पहुंचे और मारवाड़ी अतिथि सदन में शरण लिए हुए हैं। भगत के सबसे बडे पुत्र अपने परिवार के साथ काठमांड़ में रहते हैं, जबकि उनके दो छोटे पुत्र चेन्नई में काम करते हैं जिनकी पत्नी और छह ब'चों के साथ वे जीवछपुर में रह रहे थे। पश्चाताप की मुद्रा में भगत बताते हैं कि वे अपने दोनों छोटे पुत्रों का सामना कैसे करेंगे और उन्हें क्या यह कहेंगे कि अपनी जान बचाने के लिए उनके परिवारों को छोड़कर वे भाग खडे़ हुए। उनके पास पुत्रों का फोन नंबर भी नहीं है। नरपतगंज के मजदूर भुवन यादव की भी स्थिति कुछ ऐसी है। यादव बताते हैं कि 27 अगस्त को पानी का स्तर रात आठ बजे मात्र दो फुट था और थोड़ी देर में वह बढकर पांच फुट हो गया जिसकी वजह से वे भागने पर मजबूर हुए। उन्होंने बताया कि जिस वक्त उन्होंने घर छोड़ा था उनकी पत्नी और पुत्र उनके मकान से कुछ दूरी पर एक अन्य ग्रामीण के घर में टीवी देख रहे थे और उन्हें बढते जलस्तर ने इतनी भी मोहलत नहीं दी कि वे उन तक पहुंच पाएं। फारबिसगंज के ली अकेडमी हाईस्कूल परिसर में स्थित राहत शिविर में शरण लिए यादव बताते हैं कि उन्हें नहीं पता है कि अब उनकी पत्नी और पुत्र कहां है और भविष्य में उन्हें वे देख पाएंगे भी या नहीं। पूर्णिया शहर के किनारे स्थित अनूपनगर-बेलौरी में एक राहत शिविर में अपने दो ब'चो के साथ शरण ली मधेपुरा जिले के काशीपुर निवासी सब्रुन्निसा पूरी तरह टूट चुकी हैं। अपने पांच वर्षीय पुत्र मो. रजा के बाढ़ के तेज बहाव में बह जाने से गमजदा सब्रुन्निसा ने पिछले कई दिनों से भोजन करना छोड़ दिया है। उसी राहत शिविर शरण ली एक अन्य महिला अमीना अश्रुपूर्ण नेत्रों के साथ सब्रुन्ननिसा की ओर इशारा करते हुए बताती हैं कि उसे जब इस बात की जानकारी है कि उसका पुत्र मर चुका है तो ऐसे उसके हलक से भोजन कैसे उतरेगा। सब्रुन्निसा भले खुद खाना नहीं खा रही है, लेकिन वह अपने दोनों जीवित बचे ब'चों को अपने हाथों से खिचड़ी खिलाती है।किसी प्रकार भागकर फारबिसगंज और वहां से रेल से पूर्णिया पहुंचे मधेपुरा जिला के कुमारखंड निवासी संपन्न किसान राजेन्द्र सरदार की यहां रिक्शाचालक रामधनी से मुलाकात हो जाती है और वह उन्हें फटे कपड़ों और भूखे प्यासे देखकर अचंभित रह जाता है। रामधनी ने बताया कि सरदार उनके मालिक थे और रिक्शा चलाने से पहले वह उनके खेतों में काम किया करता था। वर्तमान में सरदार रामधनी के साथ उसकी झोपड़ी में रह रहे हैं।

Saturday, August 30, 2008

माया की मंजिल


मायावती की शोहरत अब देश के बाहर भी फैल रही है। फो‌र्ब्स ने उनको देश की महाशक्शिली महिलाओं में शामिल कर लिया है। इस बात पर शायद किसी को एतराज होगा। एक निम्न मध्यवर्गीय दलित परिवार से आने वाली मायावती के लिए राह बनाना आसान नहीं , लेकिन अपने बुलंद इरादों से देश के करोड़ों दलित लोगों के बीच सर्वमान्य नेता के रूप में उभरी। फो‌र्ब्स पत्रिका द्वारा स्कूल की पगडंडी से सत्ता के गलियारों तक का सफर तय करके चौथी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी बहुजन समाज पार्टी (बसपा)की अध्यक्ष मायावती के नाम को विश्व की सौ सर्वाधिक प्रभावशाली महिलाओं में शुमार किया जाना देश के सर्वसमाज में उनक ी बढ़ती पैठ का परिचायक है। कभी स्कूल में शिक्षक रहीं मायावती ने पिछले साल हुए राज्यविधानसभा के चुनाव में कामयाब सोशल इंजीनियरिंग के सहारे अपनी पार्टी को स्पष्ट बहुमत दिलाकर चौथी बार राज्य की मुख्यमंत्री बनने का अनूठा कीर्तिमान रचा। अपने सख्त प्रशासनिक रवैए के लिए मशहूर तथा पार्टी क ाडर के बीच 'बहनजी' के नाम से पहचानी जाने वाली सुश्री मायावती और उनकी पार्टी के लिए बसपा के संस्थापक कांसीराम का वर्ष 2006 में निधन एक बड़ा झटका था, लेकिन उन्होंने इससे पार्टी के मनोबल में कोई कमी नहीं आने दी। ताज कोरिडोर घोटाले में सुश्री मायावती के खिलाफ जांच का राज्यविधानसभा चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन पर विपरीत असर पड़ने कीअटकलें भी गलत साबित हुई। इस चुनाव में दलित-ब्राह्मण समीकरण के सहारे चुनाव लड़ने का बसपा का दांव चारों खाने सटीक बैठा और पार्टी ने विरोधियों को मीलों पीछे छोड़ दिया।सुश्री मायावती का जन्म 15 जनवरी 1956 को दिल्ली में हुआ था।उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद जिले के बादलपुर गांव के मूल निवासीउनके पिता प्रभुदयाल टेलीग्राफ विभाग में सुपरवाइजर के पद परकार्यरत थे।मायावती की अधिकांश शिक्षा-दीक्षा दिल्ली में ही हुई औरउन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के कालिन्दी कॉलेज से स्नातक एवंएल.एल.बी. की उपाधि हासिल करने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से बी.एड. की डिग्री भी हासिल की। अपने छात्र जीवन के दौरान विभिन्न सामाजिक गतिविधियों एवं छात्र आन्दोलनों में सक्रिय रहीं सुश्री मायावती ने इस दौरान समाज के दबे-कुचले वर्ग के लोगों की समस्याओं के खिलाफ आवाज बुलंद की। वर्ष 1977 से 1984 तक सुश्री मायावती ने दिल्ली में विभिन्न स्कूलों को शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दीं, लेकिन दलितों व समाज के कमजोर वगरें की समस्याओं के खिलाफ आवाज उठाने की तीव्र इच्छा उन्हें स्कूल की पगडंडी से राजनीति के गलियारों तक ले आई और वर्ष 1984 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी। उसी दौरान उन्हें अपने राजनीतिक गुरु कांसीराम का साथ मिला और फिर वह राजनीति के जरिए जनसेवा में रम गई।वर्ष 1984 में वह अराजनीतिक संगठन दलित एवं अल्पसंख्यकवर्ग कर्मचारी महासंघ (बामसेफ) से जुड़ गई और फिर उन्होंने दलितों एवं पिछड़ों के हितों के लिये संघर्ष करने वाले एक अन्य संगठन (डीएस-4) से नाता जोड़ा। चौदह अप्रैल 1984 को बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की स्थापना के बाद सुश्री मायावती के राजनीतिक सफर की असल शुरुआत हुई और उन्होंने उसी साल पार्टी के टिकट पर मुजफ्फरनगर जिले की कैरानासंसदीय सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली। इसके बाद सुश्री मायावती 1985 और 1987 में बिजनौर एवंहरिद्वार संसदीय सीट के उपचुनाव के लिये मैदान में उतरीं और हरिद्वार में 1.39 लाख मत हासिल करके दूसरे स्थान पर रही। सुश्री मायावती को पहली चुनावी सफलता वर्ष 1989 में राज्यविधानसभा की बिजनौर सीट पर मिली। बाद में वर्ष 1994 में वह बसपा की राज्यसभा सदस्य के रूप में चुनी गई। वर्ष 1993 में उनकी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) की मदद की, लेकिन दो जून 1995 को कथितरूप से सपा कार्यकर्ताओं द्वारा सुश्री मायावती पर जानलेवा हमले केबाद दोनों दलों के रिश्तों में कड़वाहट पैदा हो गई।मनुवादी ताकतंों की मुखर विरोधी सुश्री मायावती इस हमले मेंबाल-बाल बच गई और तीन जून 1995 को भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) की मदद से वह पहली बार राज्य की मुख्यमंत्री बनीं हालांकि उनका कार्यकाल सिर्फ चार माह का रहा और भाजपा-बसपा गठबंधन बिखर जाने की वजह से अक्टूबर माह में उनकी सरकार गिर गई। सरकार गिरने के बावजूद सुश्री मायावती की राजनीतिक साख में कमी नहीं आई और वर्ष 1996 में हुए राज्य विधानसभा चुनाव में उन्होंने बदायूं जिले की बिल्सी और सहारनपुर जिले की हरौड़ा सीट पर जीत हासिल की1 एक ही सीट का प्रतिनिधित्व करने की राजनीतिक बाध्यता की वजह से बाद में उन्होंने बिल्सी सीट छोड़ दी। वर्ष 1997 में बसपा ने एक बार फिर भाजपा का दामन थामा और दोनों दलों के बीच छह-छह माह के अंतराल पर नेतृत्व परिवर्तन की शर्त पर समझौता हुआ और सुश्री मायावती 21 मार्च 1997 को दूसरी बार राज्य की मुख्यमंत्री बनीं लेकिन छह माह बाद बसपा ने राज्य में दलित अधिनियम का समुचित क्रियान्वयन नहीं होने का आरोप लगाते हुए सरकार से समर्थन वापस ले लिया और दोनों दलों का गठबंधन एक बार फिर टूट गया। बसपा की सर्वेसर्वा की छवि रखने वाली सुश्री मायावती नेवर्ष1998 और 1999 में हुए चुनाव में अम्बेडकरनगर जिले की अकबरपुर (सु) लोकसभा पर जीत हासिल की। राज्य विधानसभा के वर्ष 2002 में हुए चुनाव में चतुराअीपूर्ण ढंग से टिकट वितरण करके बसपा ने आलोचकों के तमाम दावों को झुठलातेहुए अच्छी सफलता हासिल की। सुश्री मायावती ने सहारनपुर जिले की हरौड़ा और अम्बेडकर नगर की जहांगीरगंज विधानसभा सीटें जीतीं। बाद में उन्होंने जहांगीरगंज सीट छोड़ दी। सुश्री मायावती ने राज्य की मुख्यमंत्री के रूप में अपनी तीसरी पारी एक बार फिर भाजपा के सहयोग से तीन मई 2002 को शुरू की, लेकिन ताज हेरिटेज कॉरिडोर मामले में उनका नाम सामने आने एवंउच्चतम न्यायालय द्वारा इस मामले के साथ-साथ सुश्री मायावती केखिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो( सीबीआई) से कराने के आदेश के बाद भाजपा व बसपा गठबंधन एक बार फिर बिखर गया और राज्य सरकार गिर गई। वर्ष 2007 में स्पष्ट बहुमत के साथ चौथी बार राज्य की सत्ता कीबागडोर संभालने के बाद सुश्री मायावती ने केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार से कभी नरम-कभी गरम रिश्तों के चलते इस साल के मध्य में केंद्र सरकार से पहले समर्थन वापस लिया। बाद में वाम दलों के समर्थन वापस लेने पर केंद्र की मनमोहनसरकार द्वारा 22 जुलाई को विश्वासमत हासिल करते समय उन्होंनेजिस राजनीतिक कौशल का परिचय दिया उससे उनका नाम यकायक प्रधानमंत्री पद की सशक्त दावेदार के रूप में उभरा और वह तीसरे मोर्चे की कद्दावर नेता के रूप में प्रतिष्ठित हो गई। उनक ी बढ़ती लोकप्रियता की गूंज अब सात समुन्दर पार तक पहुंचचुकी है और फो‌र्ब्स पत्रिका ने उनका नाम विश्व की सौ सर्वाधिकप्रभावशाली महिलाओं की सूची में शामिल किया।