Saturday, December 27, 2008
बेबसता की छलक
Monday, December 22, 2008
यकीन...

रात को बिजली की गड़गड़ाहट के साथ बारिश की बंदे की टप-टप की अवाजें सीने में हलचल मचा रहा था। लोग अपनी नींद की आगोश में थे। सपनों की दुनिया देख रितु को भी सुबह की बेला में झपकी लगी थी कि अचानक में किसी की आवाज सुनकर उठ गई। अरे वह यहां! उसका एहसास गगनचुभी भेदी की तरह उसके दिल को छेद कर लिया। वह छत पर आसपास इधर-उधर देखने लगी। सड़कों पर पहले जैसे चहल-पहल थी, लेकिन पेड़-पौधे गुमशुम व शांत किसी तुफान के इंतजार में, कहीं कोई अपना नहीं दिखा, न ही हवा चली और न पत्ते हिले। कही रितु का भ्रम तो नहीं या भूत-प्रेत का चक्कर। लोग अक्सर कहां करते है पहाड़ों के आसपास के शहरों में ऐसी घटनाएं हवाएं द्वारा घटित होती है..। अरे नहीं रितु को ऐसी बातों पर विश्वास नहीं था। उसने आकाश को देखा, चांद-तारों का मिलन। कितनी दूर से तारे अपनी रोशनी से चांद को रोशन कर रहा था। तभी उमड़-धमड़ कर बादलों का आना, बारिश की बंदों का टपकना, पेड़-पौधों का हिलोर मारना। रितु का मन हुआ मदमाती बलखाती सुहानी मौसम के सौंदर्य को कैद लें..तभी सहस हवा का झोंका आया और रितु को आगोश में ले लिया। बर्फीली हवा का छेदन उसके शरीर पर होने लगा, उसने दुपट्टे को कस कर लपेटा। उस फिजा पर मोहित हो अंदर आ गई।
उसकी नींद उचट चुकी थी। किसी का अहसास उसकी दिल की धड़कन बन चुका था, जो रूक-रूक कर तेज धड़क रहा था। चाय पीते हुए अपनी दोस्त (रानी) को इस बात का बयान किया, ऐसे कैसे हो सकता है वह यहां मुझे पुकारे। वह हंसती हुई कहती है पागल हो गई है, कहीं भूत-प्रेत का चक्कर तो नहीं। उसने सहानुभूति देते हुए समझाया जिंदगी की कशमकश से जूझती ये अनुभूति तुम्हारी अंतआत्मा में उस क्षण को कैद कर लिया है.। तुम उसको और उसके अहसास कासे अपनी धड़कन और परछाईयों में देखती हो। क्य कह रही हो..? रितु रानी का चेहरा देखती ही रह गई। हां, तुम्हारा मन उस क्षण को समेट लिया...। वह प्रेम का वैभव है, तभी तुम्हें पोरू की पुकारने की आवाज सुनाई दी..। ऐसा तभी होता है जब दूर होते हुए भी कोई अपना दिल से याद करें। प्रेम जीवन की प्रतिध्यनि है..समझी। रितु की मायूस चेहरा को देखते रानी चाय पीने लगी, दोनो घनिष्ट मित्र थीं। एक-दूसरे की हर छोटी-बड़ी बातों को जानती थी। तुम पोरू से मिल क्यों नहीं लेती रितु..? अरे तुम्होर आंखों में आंसू.., क्यों रो रही हो..क्या हुआ रितु?
रितु का कंठ अवरूद्घ हो गया, उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था, मुझे कुछ भी अ'छा नहीं लग रहा रानी। मुझे क्या हो रहा..हर वक्त उसकी याद आती रहती है, लेकिन उसको मेरी परवाह नहीं, रितु की आंखों से नीर अविरल बहने लगी, मैं पोरू के बिना नहीं जी सकती रानी, आइना देखती रितु, जैसे कितने दिनों से बीमार, आंखे सुजी हुई, चेहरे विरह वेदना का पीड़ा लिए.., पोरू को देख ले एक बार..बातें कर ले तो शायद तकलीफें दूर हो..।हाथों को छूकर देखती है तो हाथ बर्फ सामान ठंडा, लेकिन सिरदर्द से फटा जाए, ललाट पर नसों की रेखाएं दिखती..दिल और दिमाग में कई सवाल। वह सोच नहीं पाई कि आखिर ऐसा क्यों! उसका अपना चेहरा कहीं खो गया था। उसे समझा नहीं आया इस पंचतत्व (शरीर) में वह खुद है या पोरू। वह खुद को भूल गई.. उसे याद था तो पोरू का चेहरा। अचानक उसकी पलकें झपकते उस पल को याद करती जो उसकी जीवनधारा को बदल दी थी..वरना वो वैसी ही थी जैसे भीड़ में सब एक जैसे होते है। पत्थर हुए मन में न कोई धवनि थी न ही काई संचार। उसके भीतर मिलों दूर फैले रेत के कतार थे सिर्फ उसकी तपिश झुलसती थी..। रानी उसकी सिर का मालिश करती हुई कहती है इस तरह कैसे जिंदा रहोंगी..। फोन करो..। मोबाइल पर पोरू का उत्तर सो जाओ अभी व्यस्त हूं, थोड़ी देर बाद फोन करना..। रूखे उत्तर से रितु सन्न रह जाती है और उसके आंखों में भर जाते। ऐसा नहीं था कितना पत्थर दिल हो गया। नहीं-नहीं कोई मजबूरी होगी, तभी ऐसी बात कहीं, मुझे मिलते बातें करते ही जीवन का धारा बदल जाती है, जब मेरा हौंसला अफजाई करता है। रितु अतीत को देख सोचती है..काश! हम कभी नहीं मिले होते..ऐसी जिंदगी जो पल-पल उसकी यादों को झकझोरती है, उसे बार-बार वही पल याद आती है जब उसके रातों में चौकीदार की सिटियों के बीच बातें होती थी। आखिर उसकी बातों में क्या था कि उसको देख अचरच रह गई। मैडम आपका सबको बीच मुस्कराना और आप औरों से अलग है, जिस पर मैं तो क्या तो सभी फिदा है। ऐसी सादगी वाली लड़की जिसकी हर अंदाज अलग हो, वह जिसकी जिंदगी में आए उसकी जिंदगी सवर जाएं..काश! उसकी अधिकारपूर्ण वाक्य उसके मन में भर गया..आखिर वह लड़का ..? लगा इसे तो बरसो से पहचानती हूं, दुनिया की भीड़ में मैं..वह औरों से अलग..? ये शायद कोई नहीं जानता पर ऐसा पहली बार हुआ किसी की बातें दिल को छू लिया.. हमेश के लिए। वह सोच में पड़ गई। आखिर क्यों कर रही है..। फिर तो नहीं चाहती हुए उसका मन भटकने लगा और उसने पाया वह भी परेशान है उसी तरह..। पोरू पर कुछ जिम्मेदारियां हैं, वह काम में डूबा रहता है..। रितु को कभी-कभी लगता है कि वह बदल गया.वह सोचने लगती है। रितु रानी को देख परेशान हुई। वह पोरू का नंबर मिलाने लगी, लेकिन रितु ने मना कर दिया। पर वह कहां मानने वाली थी उसको अपने दोस्त की चिंता थी। रानी ने मैसेज भेज ही दिया, पर उसका फोन नहीं आया। खीझ उठी रानी, देखो पोरू को तुमसे कोई मतलब नहीं है..तुम पागल हो, जो उसके लिए मरती हो। रानी अपने काम में लग गई। रानी बड़बड़ाई आखिर क्यों चाहती है पत्थर दिल इंसान को इस हद तक..। जिसे तुम्हारी परवाह नहीं। रितु जैसी भावुक लड़की दूसरों का कुछ नहीं पर अपनी जिंदगी बर्बाद कर लेती है, उसे प्रेम के दो शब्द में स्वार्थ और बेकूफी नजर आने लगे। पर रितु को यकीन था...दूसरे दिन पोरू फोन कर उसको समझाने लगा। मेरे फोन न करने की मजबुरी थी। पोरू रितु को दिलोंजान से चाहता था, आखिर मजबुरी में उसको बताना पड़ा। उसे डर था रितु की आंसुओं को रोक नहीं पाएगा, इसलिए उसने कुछ समय को विराम दे दिया..। मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती पोरू। रितु के आंसू सावन भादो की वर्षा की बरस पड़ी। जानता हूं.., महसूस करता हूं, तुम्हें हर पल अपने भीतर। पर तुम मेरी कमजोरी नहीं शक्ति रितु..यह एहसास उसकी जिंदगी में सुखद हो गया और उसने न रोने का वादा किया। उन दोनों को नहीं मालूम की उसका साथ जिंदगी भर का है या नहीं। पर तसल्ली है कि स"ा प्रेम करने वाला कोई ह,ै जो दिल से एक-दूसरे को एहसास करता है। उनकी प्रेम की गहराई और ऊंचाई भापना हद से बाहर थी। रानी ने कहा, पीड़ा और सुख के बीच वह मिठास था..जो आंखों से झलकता है..।
कहते हैं न...
यह इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजिए
एक आग का दरिया है और डूब कर जाना है..।
Saturday, December 20, 2008
बचपन
वह बलखाती सी हवाएं, अमृत सा धूप
जिस पर कुर्बान थी हमारी बचपन की शरारतें
आज तड़पाती है बचपन की नदानी भरी शरारतें
गर्मी की छुट्टी में गांव जाना
हरियाली की छांव तले रहना
फूलों से घिरी लताएं के बीच महलों में रहना
आसपास फल-फूलों से भरी बगीचों में रंग-बिरंगे तितलियों का आना
और भौंरो का गुनगुनाना
इस कोमल मन में तंरग भर जाता था
ज्येष्ठ की दोपहर में दौड़-दौड़ कर बगीचों में जाना
जिस पर बड़ों का डांट पड़ना
आज तड़पाती है बचपन की नदानी भरी शरारतें
एक अपार शांमिमयी सुबह शाम थी
न साजिश न जज्बातों की टक्कर थी
हर जगह सुनहरी ख्याबों से भरी दुनिया थी
जब पड़ा उग्र का लंगर तब फिजा वही थी
सिर्फ हवाएं की रुख बदली थी
आज तड़पाती है बचपन की नदानी भरी शरारतें
उतर चुका है, फिर भी आकाश में रोशनी है
ढल चुका है बचपन, युवा हो मन में आज भी कही बचपन है
इसलिए आज भी तड़पाती है बचपन की नदानी भरी शरारतें
Sunday, December 7, 2008
बातों की अनकही..

Tuesday, November 18, 2008
राजनैतिक पर लक्ष्मी जी की अपार माया

Sunday, October 26, 2008
शुभ दीवाली

Wednesday, October 8, 2008
गांगुली के कैरियर का घटनाक्रम

Monday, September 29, 2008
गाता रहे मेरा दिल...

गाता रहे मेरा दिल..अगर किसी पूजा घर में जलते दिये की रोशनी और घंटियों की पवित्र आवाज को मिलाकर इंसानी सूरत में बदला जाए, तो शायद वह कुछ-कुछ लता मंगेशकर की सी तस्वीर होगी। वही लता, जिसके बारे में एक दफा उस्ताद बड़े गुलामअली खां ने कहा था कि क म्बख्त कभी गलती से भी बेसुरा नहीं गाती। लगभग छह दशकों से अपनी दिलकश आवाज से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाली संगीत की देवी हेमा हरिदकर उर्फ लता मंगेश्कर के गीत आज भी श्रोताओं को बरबस अपनी ओर आकर्षित करते हैं जिसे सुनकर सबों के दिल से यही आवाज आती है गाता रहे तेरा दिल..। लता मंगेश्कर के पिता पंडित दीनानाथ मंगेश्कर मराठी रंगमंच से जुड़े हुए थे। पांच वर्ष की उम्र मे लता ने अपने पिता के साथ नाटकोंमे अभिनय शुरू कर दिया और इसके साथ ही वह संगीत की शिक्षा अपने पिता से लेने लगी। 28 सिंतबर 1929 को मध्यप्रदेश में इंदौर शहर के एक मध्यम वर्गीय मराठी परिवार मे जन्मी लता ने वर्ष 1942 मे किटी हसाल..के लिए अपना पहला गाना गाया, लेकिन उनके पिता दीनानाथ मंगेश्कर कोलता का फिल्मों के लिए गाना पसंद नहीं आया और उन्होंने उस फिल्म से लता के गाए गीत को हटवा दिया। वर्ष 1942 मे तेरह वर्ष की छोटी उम्र में ही लता के सिर से पिता का साया मे उठ गया और परिवार की जिम्मेदारी उनके उपर आ गई। इसके बाद उनका पूरा परिवार पूणो से मुंबई आ गया। हालांकि लता को फिल्मों मे अभिनय करना जरा भी पसंद नही था बावजूद इसके परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी को उठाते हुए उन्होंने फिल्मों मे अभिनय करना शुरूकर दिया। वर्ष 1942 मे लता को पहली मंगलगौर..में अभिनय करने का मौका मिला। वर्ष 1945 में लता की मुलाकात संगीतकार गुलाम हैदर से हुई। गुलाम हैदर लता के गाने के अंदाज से काफी प्रभावित हुए और उन्होंने फिल्म निर्माता एस. मुखर्जी से यह गुजारिश की कि वह लता को अपनी फिल्म शहीद में गाने का मौका दे। मुखर्जी को उनकी आवाज पसंद नहीं आई और उन्होंने लता को अपनी फिल्म में लेने से इंकार कर दिया। इस बात को लेकर गुलाम हैदर काफी गुस्सा हुए और उन्होंने कहा यह लड़की आगे इतना अधिक नाम करेगी कि बड़े-बड़े निर्माता-निर्देशक उसे अपनी फिल्मों में गाने के लिए गुजारिश करेंगे। वर्ष 1949 में फिल्म महल के गाने आयेगा आने वाला.. गाने के बाद लता बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गई। इसके बाद राजकपूर की बरसात के गाने जिया बेकरार है.., हवा में उड़ता जाए..जैसे गीत गाने के बाद लता मंगेश्कर बॉलीवुड में एक सफल पाश्र्वगायिका के रूप मे स्थापित हो गई। पचास के दशक में गुलाम हैदर की कही गई बात सच निकली और लता मंगेश्कर, शंकर जयकिशन, एस.डी.बर्मन, सी.रामचंदर्् मदन मोहन, हेमन्त कुमार और सलिल चौधरी जैसे नामी-गिरामी संगीतकारों की चहेती गायिका बन गई। साहिर लुधियानवी के लिखे गीत और एस.डी. बर्मन के संगीत निर्देशन मे लता ने कई हिट गाने गाए। साहिर लुधियानवी के रचित गीत पर लता ने वर्ष 1961 में फिल्म हमदोनों के लिए अल्लाह तेरो नाम..भजन गाया जो लोगों मे काफी लोकप्रिय हुआ था।हिंदी सिनेमा के शो मैन कहे जाने वाले राजकपूर को सदा अपनी फिल्मों के लिए लता मंगेश्कर की आवाज की जरूरत रहती थी। राजकपूर लता की आवाज के इस कदर प्रभावित थे कि उन्होंने लता मंगेश्कर को सरस्वती का दर्जा तक दे रखा था। साठ के दशक में लता मंगेश्कर बॉलीवुड में पाश्र्वगायिकाओं की महारानी कही जाने लगी। लता की आवाज से नौशाद का संगीत सज उठता था। संगीतकार नौशाद लता के आवाज के इस कदर दीवाने थे कि उन्होंने अपनी हर फिल्म के लिए लता को ही ंिलया करते थे। वर्ष 1960 में प्रदर्शित फिल्म मुगले आजम के गीत मोहे पनघट पे गीत की रिकार्डिंग के दौरान नौशाद ने लता से कहा था मैने यह गीत केवल तुम्हारे लिए ही बनाया है इस गीत को कोई और नहीं गा सकता है। वर्ष 1969 में लक्ष्मीकांत प्यारे लाल के संगीत निर्देशन में लता ने फिल्म इंतकाम का गाना आ जानें जा..गाकर यह साबित कर दिया कि वह आशा भोंसले की तरह पाश्चात्य धुन पर भी गा सकती हैं। वर्ष 1976 मे ख्ययाम के संगीत निर्देशन में लता मंगेश्कर ने फिल्म के लिए कभी-कभी मेरे दिल मे ख्याल आता है.. गाना गाया, जो आज भी हिंदी सिनेमा के कलात्मक गानों मे शुमार किया जाता है। लता मंगेश्कर को उनके गाए गीत के लिए चार बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। लता मंगेश्कर को सबसे पहले वर्ष 1958 मे प्रदर्शित फिल्म मधुमती के आजा रे परदेसी.. गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायिका का फिल्म फेयर पुरस्कार दिया गया था। इसके बाद वर्ष 1962 मे फिल्म बीस साल बाद के गाने कहीं दीप जले कहीं दिल.. वर्ष 1965 मे फिल्म खानदान के तुम्ही मेरे मंदिर तुम्ही मेरी पूजा.. और वर्ष 1969 मे फिल्म जीने की राह के गाने आप मुझे अ''छे लगने लगे..के लिए भी लता मंगेश्कर फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित की गई। इसके अलावा वर्ष 1993 में उन्हें फिल्म फेयर का लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड भी दिया गया। इसके साथ ही वर्ष 1994 में लता मंगेश्कर फिल्म हम आपके हैं कौन के गाने दीदी तेरा देवर दीवाना.. गाने के लिये फिल्म फेयर के विशेष पुरस्कार से सम्मानित की गई। लता मंगेश्कर को उनके गाए गीत वर्ष 1972 में फिल्म परिचय, वर्ष 1975 में कोराकागज और वर्ष 1990 में फिल्म के लिए नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया गया। इसके अलावा लता मंगेश्कर को वर्ष 1969 में पदमभूषण, वर्ष 1989 में दादा साहब फाल्के सम्मान, 1997 में राजीव गांधी सम्मान, 1999 में पदमविभूषण, वर्ष 2001 में भारत रत्न जैसे कई सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।
Saturday, September 13, 2008
सेल
Sunday, September 7, 2008
किनारे की तलाश में भटकती जिंदगी

भूख से तड़प रही जिंदगी
किसी का आसियाना खो गया
तो किसी का अपना खो गया।
बिहार में कोसी नदी में आयी प्रलयंकारी बाढ़ फिल्मी नहीं है, लेकिन इसने कई ऐसी त्रासद कहानियां छोड़ी हैं जो फिल्मों में ही दिखती हैं कि पानी के प्रवाह में पूरा का पूरा हंसता खेलता परिवार बिखर जाए और फिर एक-दूसरे को ढूंढता फिरे। बिहार में कोसी नदी से आई बाढ़ ने जहां लोगों को घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया है, वहीं संकट की इस घड़ी में मानवता के धर्म के चलते सभी मजहबी दीवारें भी ढह गई हैं। भारतीय परंपरा में नदियां जीवन दायिनी मानी जाती हैं। मां भी जीवन देती है, लेकिन बिहार के लिए शाप बन चुकी कोसी में आयी प्रलयंकारी बाढ़ में सबकुछ गंवाने वाली एक मां रेलवे स्टेशन पर बिलख रही है। क्योंकि अपने दुधमुंहे को पिलाने के लिए उसके आंचल में दूध नहीं उतर रहा है। प्राकृतिक आपदा में लोगों के सिर ढांपने की जगह बने पूर्णिया रेलवे स्टेशन पर शरण लिए झुनकी अपने चार महीने के दुघमुंहे ब'चे को गोद में लिए बिलख रही है। पिछले कई दिनों से बाढ़ में फंसे रहने और भूखे रहने के कारण उसकी इतनी सामर्थ्य नहीं बची कि भूख से तड़प रहे रोते बिलखते अपने ब'चे को स्तनपान कराकर उसकी पेट की आग बुझा सके। झुनकी के साथ आयी मधेपुरा जिले के सौर बाजार की रहने वाली उसकी पड़ोसन अहल्या उसे रोता देख ढांढस बंधाने का प्रयास करती है, लेकिन आंसू हैं कि थमते ही नहीं। थमे भी कैसे। ब'चा भूखा है।सहरसा जिले में खाकी पैंट पहने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यकर्ता अपने बाढ़ पीडि़त रोजेदार मुस्लिम भाइयों को पवित्र महीने रमजान में इफ्तार करा रहे हैं। यह नजारा सहरसा के जिला स्कूल परिसर में संघ परिवार के एक घटक सेवा भारती द्वारा चलाए जा रहे एक राहत शिविर का है। यहां रमजान में रोजा रखने वाले मुस्लिम समुदाय के लगभग 100 लोगों को आरएसएस के कार्यकर्ता अजान होते ही मुढी और घुधनी परोस कर उन्हें रोजा इफ्तार करा रहे हैं। मधेपुरा जिले के परमा गांव निवासी मो. सलाउद्दीन राहत शिविर में अपने परिवार के साथ एक सप्ताह से यहां शरण लिए है। उनके साथ कोई भेदभाव नहीं बरता गया। ऐसा ही कुछ नजारा मधेपुरा स्थित एक मुस्लिम मदरसा के छात्रावास का भी है, जहां कुमारखंड और मुरलीगंज के विभिन्न इलाकों से अपनी जान बचाकर आए साठ से अधिक साधु शरण लिए हुए हैं। इन्हें यहां के मुस्लिम शिक्षक और छात्रों द्वारा न केवल उनके आवास और भोजन की व्यवस्था की गई है, बल्कि उन्हें यहां पूजा पाठ करने के लिए उन्होंने एक खास स्थान भी दे रखा है। मधेपुरा स्थित मदरसा के छात्रवास में शरण लिए साधु महेन्द्र साह को छात्रावास में किसी तरह की कोई कठिनाई नहीं है। पूर्णिया जिले के भनगाहा निवासी सुप्रिया देवी भाग्यशाली नहीं रही और उसने बचाव कार्य मे लगे सेना के जवानों से हाथ जोड़ते हुए कहा कि वे बाढ़ में फंसे उसके पति और ब'चों को बचा लें। कोसी में आई इस प्रलयंकारी बाढ़ ने अमीर-गरीब सभी को एक जैसा बना दिया है। अब वे राहत शिविरों में एक साथ सोते और खाते पीते हैं। संकट के इस घड़ी में भी सबकुछ लुटा चुके ये लोग थोड़ी सी खुशी मिलने पर भी सारे गमों को भूलकर उसका आनंद उठाने में कोई संकोच नहीं करते। ऐसा ही माहौल सहरसा जिले के आर जे महिला कालेज परिसर में स्थित राहत शिविर में है, जहां रुपा नामक एक महिला ने एक ब'ची को जन्म दिया है और उसके छठी के अवसर पर महिलाएं एकत्रित होकर सोहर गीत गा रही हैं। ब'चे के जन्म पर सोहर गया जाता है। रुपा के पति सुरेन्द्र का कहना है कि वे अपनी इस बिटिया का नाम इसी नदी के नाम पर कोसी रखेंगे जिसने उनका सबकुछ तबाह और बर्बाद कर दिया है, ताकि कोसी मइया उन्हें भविष्य में और किसी विपदा में न डाले। कोसी प्रक्षेत्र के बाढ़ प्रभावित लोग तीन सौ किलोमीटर की यात्रा कर पटना रेलवे स्टेशन पहुंच रहे हैं और उनके आने से रेलवे स्टेशन पर एक बड़े राहत शिविर जैसा नजारा है। बाढ़ की स्थिति में कुछ सुधार आते ही इस जल प्रलय में एक-दूसरे से बिछड़े गए लोग अपनों की तलाश में एक राहत शिविर से दूसरे राहत शिविर का चक्कर लगा रहे हैं और उनकी आंखों में अब भी तबाही का खौफ तारी है। सुरक्षित ठिकानों की ओर भागने के क्रम में मधेपुरा जिले के बुधमा गांव निवासी सावित्री देवी पथराई आंखों से रेलवे स्टेशन बस अड्डा और विभिन्न राहत शिविरों में अपने पति और दो पुत्रियों को ढूंढती फिर रही हैं, जो जीवन बचाने के दौरान उनसे बिछड़ गऐ। बाढ़ त्रासदी से पूर्व संपन्न किसान रहे सुपौल जिले के जीवछपुर निवासी जगदीश भगत की भी ऐसी ही हालत है। वह भी अपने परिवार के सदस्यों की तलाश में इधर-उधर भटकते फिर रहे हैं। ये अपने बिछड़े परिजनों की तलाश में सुबह होते ही निकल पड़ते हैं और रात होने पर थक हार कर मायूस फिर अपने राहत शिविर में लौट आते हैं। पिछले कई दिनों से उनकी यही दिनचर्या है, लेकिन इसी आस में कि उनसे कहीं न कहीं मुलाकात हो ही जाएगी उनकी यह कोशिश जारी है।70 वर्षीय जगदीश भगत अपने गृह जिला से 75 किलोमीटर की दूरी पर फारबिसगंज में एक राहत शिविर में शरण लिए हुए हैं। घर से भागने के समय उनकी दो बहुएं और छह पौत्र पौत्रियां वहां छूट गई। भगत ने बताया कि वह अपने घर के बाहर थे तभी गांव में बाढ़ का पानी प्रवेश कर गया और देखते ही देखते पानी छाती तक पहुंच गया और अपनी जान बचाने के लिए वह एक पेड़ पर चढ़ गए। दो दिनों के बाद सेना की एक बोट की मदद से वे यहां पहुंचे और मारवाड़ी अतिथि सदन में शरण लिए हुए हैं। भगत के सबसे बडे पुत्र अपने परिवार के साथ काठमांड़ में रहते हैं, जबकि उनके दो छोटे पुत्र चेन्नई में काम करते हैं जिनकी पत्नी और छह ब'चों के साथ वे जीवछपुर में रह रहे थे। पश्चाताप की मुद्रा में भगत बताते हैं कि वे अपने दोनों छोटे पुत्रों का सामना कैसे करेंगे और उन्हें क्या यह कहेंगे कि अपनी जान बचाने के लिए उनके परिवारों को छोड़कर वे भाग खडे़ हुए। उनके पास पुत्रों का फोन नंबर भी नहीं है। नरपतगंज के मजदूर भुवन यादव की भी स्थिति कुछ ऐसी है। यादव बताते हैं कि 27 अगस्त को पानी का स्तर रात आठ बजे मात्र दो फुट था और थोड़ी देर में वह बढकर पांच फुट हो गया जिसकी वजह से वे भागने पर मजबूर हुए। उन्होंने बताया कि जिस वक्त उन्होंने घर छोड़ा था उनकी पत्नी और पुत्र उनके मकान से कुछ दूरी पर एक अन्य ग्रामीण के घर में टीवी देख रहे थे और उन्हें बढते जलस्तर ने इतनी भी मोहलत नहीं दी कि वे उन तक पहुंच पाएं। फारबिसगंज के ली अकेडमी हाईस्कूल परिसर में स्थित राहत शिविर में शरण लिए यादव बताते हैं कि उन्हें नहीं पता है कि अब उनकी पत्नी और पुत्र कहां है और भविष्य में उन्हें वे देख पाएंगे भी या नहीं। पूर्णिया शहर के किनारे स्थित अनूपनगर-बेलौरी में एक राहत शिविर में अपने दो ब'चो के साथ शरण ली मधेपुरा जिले के काशीपुर निवासी सब्रुन्निसा पूरी तरह टूट चुकी हैं। अपने पांच वर्षीय पुत्र मो. रजा के बाढ़ के तेज बहाव में बह जाने से गमजदा सब्रुन्निसा ने पिछले कई दिनों से भोजन करना छोड़ दिया है। उसी राहत शिविर शरण ली एक अन्य महिला अमीना अश्रुपूर्ण नेत्रों के साथ सब्रुन्ननिसा की ओर इशारा करते हुए बताती हैं कि उसे जब इस बात की जानकारी है कि उसका पुत्र मर चुका है तो ऐसे उसके हलक से भोजन कैसे उतरेगा। सब्रुन्निसा भले खुद खाना नहीं खा रही है, लेकिन वह अपने दोनों जीवित बचे ब'चों को अपने हाथों से खिचड़ी खिलाती है।किसी प्रकार भागकर फारबिसगंज और वहां से रेल से पूर्णिया पहुंचे मधेपुरा जिला के कुमारखंड निवासी संपन्न किसान राजेन्द्र सरदार की यहां रिक्शाचालक रामधनी से मुलाकात हो जाती है और वह उन्हें फटे कपड़ों और भूखे प्यासे देखकर अचंभित रह जाता है। रामधनी ने बताया कि सरदार उनके मालिक थे और रिक्शा चलाने से पहले वह उनके खेतों में काम किया करता था। वर्तमान में सरदार रामधनी के साथ उसकी झोपड़ी में रह रहे हैं।
Saturday, August 30, 2008
माया की मंजिल


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