Saturday, December 27, 2008
बेबसता की छलक
हट साले..रोज-रोज चला आता है भिख मांगने। तेरे मां-बाप नहीं है क्या? वह चिढ़ते हुए कहा। हर दिन हराम की कमाई खाने की आदत है साले को। ऐसे लोगों की न जात का पता होता है न घरवालों का! ऐ तो अपने जन्म का भोग रहे हैं। ऐसे कहने वाले वही साहब थे, जो हर रोज स्टेशन पर दोस्तों की महफिल लगाए रहते थे। उनकी नजरें हर उस सुंदर लोगों पर रहता था, जो देखने में..ये तो आप समझा सकते हैं। इतने में वहां चार-पांच बच्चे उनकी पांव छूकर कहने लगे माई-बाप पैसे दे दो, खाने को कुछ भी नहीं है। क्यों तेरी मां भाग गई क्या? बेबसता की छलक उनकी आंखों में साफ दिखाई दे रहा है। मगर क्या करते समाज के मारे थे। कुछ ही दूरी पर खड़ी एक बेजान सी महिला लड़खड़ाते चली आ रही थी, उसके कपड़े बिखड़े? बाल फैले थे। उसकी आंखों की नीचे स्याह काले घेरे थे। देख कर लग रहा था जैसे उसका कोई अपना खो गया या उसके साथ कुछ हो गया है। उसकी एक ही रट थी बाबू जी कुछ दे दो! बाबू जी कुछ दे दो! कुछ लोग उसकी लाचारी को देख मजाक कर रहे थे कही गई होगी! फिकरे के साथ मजे ले रहे लोगों में एक भले इनसान बुदबुदाया। अजीब कूढ़मगज लोग है मजे ले रहे हैं, लेकिन लाचार था। ज्यादा कुछ कहता तो लोग कहते ईमानदारी और सहिष्णुता का घुटी पिलाने आया है।
Monday, December 22, 2008
यकीन...

रात को बिजली की गड़गड़ाहट के साथ बारिश की बंदे की टप-टप की अवाजें सीने में हलचल मचा रहा था। लोग अपनी नींद की आगोश में थे। सपनों की दुनिया देख रितु को भी सुबह की बेला में झपकी लगी थी कि अचानक में किसी की आवाज सुनकर उठ गई। अरे वह यहां! उसका एहसास गगनचुभी भेदी की तरह उसके दिल को छेद कर लिया। वह छत पर आसपास इधर-उधर देखने लगी। सड़कों पर पहले जैसे चहल-पहल थी, लेकिन पेड़-पौधे गुमशुम व शांत किसी तुफान के इंतजार में, कहीं कोई अपना नहीं दिखा, न ही हवा चली और न पत्ते हिले। कही रितु का भ्रम तो नहीं या भूत-प्रेत का चक्कर। लोग अक्सर कहां करते है पहाड़ों के आसपास के शहरों में ऐसी घटनाएं हवाएं द्वारा घटित होती है..। अरे नहीं रितु को ऐसी बातों पर विश्वास नहीं था। उसने आकाश को देखा, चांद-तारों का मिलन। कितनी दूर से तारे अपनी रोशनी से चांद को रोशन कर रहा था। तभी उमड़-धमड़ कर बादलों का आना, बारिश की बंदों का टपकना, पेड़-पौधों का हिलोर मारना। रितु का मन हुआ मदमाती बलखाती सुहानी मौसम के सौंदर्य को कैद लें..तभी सहस हवा का झोंका आया और रितु को आगोश में ले लिया। बर्फीली हवा का छेदन उसके शरीर पर होने लगा, उसने दुपट्टे को कस कर लपेटा। उस फिजा पर मोहित हो अंदर आ गई।
उसकी नींद उचट चुकी थी। किसी का अहसास उसकी दिल की धड़कन बन चुका था, जो रूक-रूक कर तेज धड़क रहा था। चाय पीते हुए अपनी दोस्त (रानी) को इस बात का बयान किया, ऐसे कैसे हो सकता है वह यहां मुझे पुकारे। वह हंसती हुई कहती है पागल हो गई है, कहीं भूत-प्रेत का चक्कर तो नहीं। उसने सहानुभूति देते हुए समझाया जिंदगी की कशमकश से जूझती ये अनुभूति तुम्हारी अंतआत्मा में उस क्षण को कैद कर लिया है.। तुम उसको और उसके अहसास कासे अपनी धड़कन और परछाईयों में देखती हो। क्य कह रही हो..? रितु रानी का चेहरा देखती ही रह गई। हां, तुम्हारा मन उस क्षण को समेट लिया...। वह प्रेम का वैभव है, तभी तुम्हें पोरू की पुकारने की आवाज सुनाई दी..। ऐसा तभी होता है जब दूर होते हुए भी कोई अपना दिल से याद करें। प्रेम जीवन की प्रतिध्यनि है..समझी। रितु की मायूस चेहरा को देखते रानी चाय पीने लगी, दोनो घनिष्ट मित्र थीं। एक-दूसरे की हर छोटी-बड़ी बातों को जानती थी। तुम पोरू से मिल क्यों नहीं लेती रितु..? अरे तुम्होर आंखों में आंसू.., क्यों रो रही हो..क्या हुआ रितु?
रितु का कंठ अवरूद्घ हो गया, उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था, मुझे कुछ भी अ'छा नहीं लग रहा रानी। मुझे क्या हो रहा..हर वक्त उसकी याद आती रहती है, लेकिन उसको मेरी परवाह नहीं, रितु की आंखों से नीर अविरल बहने लगी, मैं पोरू के बिना नहीं जी सकती रानी, आइना देखती रितु, जैसे कितने दिनों से बीमार, आंखे सुजी हुई, चेहरे विरह वेदना का पीड़ा लिए.., पोरू को देख ले एक बार..बातें कर ले तो शायद तकलीफें दूर हो..।हाथों को छूकर देखती है तो हाथ बर्फ सामान ठंडा, लेकिन सिरदर्द से फटा जाए, ललाट पर नसों की रेखाएं दिखती..दिल और दिमाग में कई सवाल। वह सोच नहीं पाई कि आखिर ऐसा क्यों! उसका अपना चेहरा कहीं खो गया था। उसे समझा नहीं आया इस पंचतत्व (शरीर) में वह खुद है या पोरू। वह खुद को भूल गई.. उसे याद था तो पोरू का चेहरा। अचानक उसकी पलकें झपकते उस पल को याद करती जो उसकी जीवनधारा को बदल दी थी..वरना वो वैसी ही थी जैसे भीड़ में सब एक जैसे होते है। पत्थर हुए मन में न कोई धवनि थी न ही काई संचार। उसके भीतर मिलों दूर फैले रेत के कतार थे सिर्फ उसकी तपिश झुलसती थी..। रानी उसकी सिर का मालिश करती हुई कहती है इस तरह कैसे जिंदा रहोंगी..। फोन करो..। मोबाइल पर पोरू का उत्तर सो जाओ अभी व्यस्त हूं, थोड़ी देर बाद फोन करना..। रूखे उत्तर से रितु सन्न रह जाती है और उसके आंखों में भर जाते। ऐसा नहीं था कितना पत्थर दिल हो गया। नहीं-नहीं कोई मजबूरी होगी, तभी ऐसी बात कहीं, मुझे मिलते बातें करते ही जीवन का धारा बदल जाती है, जब मेरा हौंसला अफजाई करता है। रितु अतीत को देख सोचती है..काश! हम कभी नहीं मिले होते..ऐसी जिंदगी जो पल-पल उसकी यादों को झकझोरती है, उसे बार-बार वही पल याद आती है जब उसके रातों में चौकीदार की सिटियों के बीच बातें होती थी। आखिर उसकी बातों में क्या था कि उसको देख अचरच रह गई। मैडम आपका सबको बीच मुस्कराना और आप औरों से अलग है, जिस पर मैं तो क्या तो सभी फिदा है। ऐसी सादगी वाली लड़की जिसकी हर अंदाज अलग हो, वह जिसकी जिंदगी में आए उसकी जिंदगी सवर जाएं..काश! उसकी अधिकारपूर्ण वाक्य उसके मन में भर गया..आखिर वह लड़का ..? लगा इसे तो बरसो से पहचानती हूं, दुनिया की भीड़ में मैं..वह औरों से अलग..? ये शायद कोई नहीं जानता पर ऐसा पहली बार हुआ किसी की बातें दिल को छू लिया.. हमेश के लिए। वह सोच में पड़ गई। आखिर क्यों कर रही है..। फिर तो नहीं चाहती हुए उसका मन भटकने लगा और उसने पाया वह भी परेशान है उसी तरह..। पोरू पर कुछ जिम्मेदारियां हैं, वह काम में डूबा रहता है..। रितु को कभी-कभी लगता है कि वह बदल गया.वह सोचने लगती है। रितु रानी को देख परेशान हुई। वह पोरू का नंबर मिलाने लगी, लेकिन रितु ने मना कर दिया। पर वह कहां मानने वाली थी उसको अपने दोस्त की चिंता थी। रानी ने मैसेज भेज ही दिया, पर उसका फोन नहीं आया। खीझ उठी रानी, देखो पोरू को तुमसे कोई मतलब नहीं है..तुम पागल हो, जो उसके लिए मरती हो। रानी अपने काम में लग गई। रानी बड़बड़ाई आखिर क्यों चाहती है पत्थर दिल इंसान को इस हद तक..। जिसे तुम्हारी परवाह नहीं। रितु जैसी भावुक लड़की दूसरों का कुछ नहीं पर अपनी जिंदगी बर्बाद कर लेती है, उसे प्रेम के दो शब्द में स्वार्थ और बेकूफी नजर आने लगे। पर रितु को यकीन था...दूसरे दिन पोरू फोन कर उसको समझाने लगा। मेरे फोन न करने की मजबुरी थी। पोरू रितु को दिलोंजान से चाहता था, आखिर मजबुरी में उसको बताना पड़ा। उसे डर था रितु की आंसुओं को रोक नहीं पाएगा, इसलिए उसने कुछ समय को विराम दे दिया..। मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती पोरू। रितु के आंसू सावन भादो की वर्षा की बरस पड़ी। जानता हूं.., महसूस करता हूं, तुम्हें हर पल अपने भीतर। पर तुम मेरी कमजोरी नहीं शक्ति रितु..यह एहसास उसकी जिंदगी में सुखद हो गया और उसने न रोने का वादा किया। उन दोनों को नहीं मालूम की उसका साथ जिंदगी भर का है या नहीं। पर तसल्ली है कि स"ा प्रेम करने वाला कोई ह,ै जो दिल से एक-दूसरे को एहसास करता है। उनकी प्रेम की गहराई और ऊंचाई भापना हद से बाहर थी। रानी ने कहा, पीड़ा और सुख के बीच वह मिठास था..जो आंखों से झलकता है..।
कहते हैं न...
यह इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजिए
एक आग का दरिया है और डूब कर जाना है..।
Saturday, December 20, 2008
बचपन
वह पिपल की छांव, खुली आकाश में हमारा बचपन
वह बलखाती सी हवाएं, अमृत सा धूप
जिस पर कुर्बान थी हमारी बचपन की शरारतें
आज तड़पाती है बचपन की नदानी भरी शरारतें
गर्मी की छुट्टी में गांव जाना
हरियाली की छांव तले रहना
फूलों से घिरी लताएं के बीच महलों में रहना
आसपास फल-फूलों से भरी बगीचों में रंग-बिरंगे तितलियों का आना
और भौंरो का गुनगुनाना
इस कोमल मन में तंरग भर जाता था
ज्येष्ठ की दोपहर में दौड़-दौड़ कर बगीचों में जाना
जिस पर बड़ों का डांट पड़ना
आज तड़पाती है बचपन की नदानी भरी शरारतें
एक अपार शांमिमयी सुबह शाम थी
न साजिश न जज्बातों की टक्कर थी
हर जगह सुनहरी ख्याबों से भरी दुनिया थी
जब पड़ा उग्र का लंगर तब फिजा वही थी
सिर्फ हवाएं की रुख बदली थी
आज तड़पाती है बचपन की नदानी भरी शरारतें
उतर चुका है, फिर भी आकाश में रोशनी है
ढल चुका है बचपन, युवा हो मन में आज भी कही बचपन है
इसलिए आज भी तड़पाती है बचपन की नदानी भरी शरारतें
वह बलखाती सी हवाएं, अमृत सा धूप
जिस पर कुर्बान थी हमारी बचपन की शरारतें
आज तड़पाती है बचपन की नदानी भरी शरारतें
गर्मी की छुट्टी में गांव जाना
हरियाली की छांव तले रहना
फूलों से घिरी लताएं के बीच महलों में रहना
आसपास फल-फूलों से भरी बगीचों में रंग-बिरंगे तितलियों का आना
और भौंरो का गुनगुनाना
इस कोमल मन में तंरग भर जाता था
ज्येष्ठ की दोपहर में दौड़-दौड़ कर बगीचों में जाना
जिस पर बड़ों का डांट पड़ना
आज तड़पाती है बचपन की नदानी भरी शरारतें
एक अपार शांमिमयी सुबह शाम थी
न साजिश न जज्बातों की टक्कर थी
हर जगह सुनहरी ख्याबों से भरी दुनिया थी
जब पड़ा उग्र का लंगर तब फिजा वही थी
सिर्फ हवाएं की रुख बदली थी
आज तड़पाती है बचपन की नदानी भरी शरारतें
उतर चुका है, फिर भी आकाश में रोशनी है
ढल चुका है बचपन, युवा हो मन में आज भी कही बचपन है
इसलिए आज भी तड़पाती है बचपन की नदानी भरी शरारतें
Sunday, December 7, 2008
बातों की अनकही..

बातों की अनकही कोई क्या जाने,न भी जाने तो क्या जाने, जाने भी तो क्या जाने, बातों का छलावा तो बहुत करते है, कोई खुद उस छलावा को जाने तो समझे,ख्वाबों के टूटने का गम नहीं, जितनी बातों के बदले का होता है, दर्द तो ख्वाबों के टूटने का भी होता है, पर उस दर्द का क्या जो बन जाता किसी का फसाना, दिन बितते गए रात ढलती रही पर न बदला तो उसका.., गलती उसकी नहीं गलती उस वक्त की जो किसी के विश्वास और भावनाओं को बांध नहीं पाया। समझते दोनों थे पर जज्बातों का उल्लेख करूं क्या...!
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