Monday, January 26, 2009
हार्दिक बधाईयां
सभी देशवासियों को गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर हार्दिक बधाईयां। देश के खातिर जान वाले शहीदों को सत-सत नम। उन जबाज युवाओं को सलाम जो सरहद पर मुश्तैदी से डटे हैं और उन मां बहनों को भी सलाम जिसने अपने भाई-बेटों को देश के खतिर कुर्बान कर दिया।एक बार फिर हमने साबित कर दिया है न हम डरे थे न हम डरे और न कभी डरेंगे। भारतीय गणतंत्र की 60वीं सालगिरह के मौके पर आज राजपथ पर देश के सुरक्षा बलों के अप्रतिम शौर्य की गूंज के साथ ही देश की सैन्य शक्ति और विविधतापूर्ण सांस्कृतिक विरासत के रंगबिरंगे प्रदर्शन से देशवासी राष्ट्रीय गौरव की भावना से अभिभूत हो गए। हम सभी को जाति एंव मजहब आधारित संकीर्णता से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में काम करने की कोशिश करनी चाहिए। देश की पारंपरिक कला, गंगा जमुनी संस्कृति, प्रेम भाईचारे और अनेकता में एकता के संदेश को भव्य झांकियों के जरिए लोक कलाकारों ने पेश किया। साठवें गणतंत्र दिवस समारोह में मुंबई के आतंकी हमलों के शहीद एक बार फिर लोगों की चर्चा के विषय बने रहे। आतंकी हमलों में जान गंवाने वाले वीर जवानों को सर्वो'च वीरता पुरस्कार अशोक चक्र से नवाजा गया। दिल्ली पुलिस के मोहन चंद शर्मा, मुंबई पुलिस के हेमंत करकरे, अशोक काम्टे, विजय सालस्कर और तुकाराम ओंबले तथा एनएसजी के मेजर संदीप उन्नीकृष्णन और हवलदार गजेंद्र सिंह व अन्य अधिकारियों के परिजनों ने अशोक चक्र ग्रहण किया
Saturday, January 17, 2009
रिश्तों का संबंध
रिश्ते के बीच जीना आसान नहीं होता
जीवन में दिल से रिश्तों का बनना आसान नहीं होता
जिंदगी में ऐसे मोड़ आए कि मन में रिश्तों का लगाव हो गया
फैसलों से फासले कुछ इस तरह से तय हुए कि
अनछूए रिश्ते दिल में बरबस हो गया
अपनत्व का रिश्ता दिल से दिल का है
तभी तो रिश्तों के बीच जीते हैं
इस युग में लोगों की अचानक ही होगा मूल्यांकन
कुछ सच है कुछ झूठ वह भी मन के रिश्तों के बीच
केवल सुखद भ्रमों में जीती रहती थी मैं
अपने मन को बेगानों पर लूटा अपनत्व ढूढ़ती थी
एक नया धरातल आया था, जहां फासले खुद खड़े थे?
मन के रिश्ते महलों की तरह खंडहर होने का था
फिर भी आस था जिंदगी में अपने मन की रिश्तों के बीच जीना का
हर दिन नया ख्याब, हर सुबह नया एहसास,हर शाम खुशी व गम का मिलनहर रात मन में नया सवाल?क्या अनुभव था रिश्तों के बीच लगव का
किसी के साथ मन का लगाव या मन से रिश्तों का हर पल अनुभव करती है जो ताह
जिंदगी हर रिश्तों के बीच याद आएगी।
जीवन में दिल से रिश्तों का बनना आसान नहीं होता
जिंदगी में ऐसे मोड़ आए कि मन में रिश्तों का लगाव हो गया
फैसलों से फासले कुछ इस तरह से तय हुए कि
अनछूए रिश्ते दिल में बरबस हो गया
अपनत्व का रिश्ता दिल से दिल का है
तभी तो रिश्तों के बीच जीते हैं
इस युग में लोगों की अचानक ही होगा मूल्यांकन
कुछ सच है कुछ झूठ वह भी मन के रिश्तों के बीच
केवल सुखद भ्रमों में जीती रहती थी मैं
अपने मन को बेगानों पर लूटा अपनत्व ढूढ़ती थी
एक नया धरातल आया था, जहां फासले खुद खड़े थे?
मन के रिश्ते महलों की तरह खंडहर होने का था
फिर भी आस था जिंदगी में अपने मन की रिश्तों के बीच जीना का
हर दिन नया ख्याब, हर सुबह नया एहसास,हर शाम खुशी व गम का मिलनहर रात मन में नया सवाल?क्या अनुभव था रिश्तों के बीच लगव का
किसी के साथ मन का लगाव या मन से रिश्तों का हर पल अनुभव करती है जो ताह
जिंदगी हर रिश्तों के बीच याद आएगी।
Friday, January 16, 2009
जुड़ी थी जमीं के तार
शहरों में न सिर्फ आसमान की रंगीनी एक जैसी थी, बल्कि जमीन पर लोगों का उत्साह भी एक जैसा ही था। चांद, तारा, कंठा बेलन, छड़ीला, अद्घा और मोमबत्ता की डोर थामे बच्चे बूढ़े सब न सिर्फ अपनी पतंगबाजी कौशल को आजमाए थे, बल्कि दूसरे के पतंग की डोर काटने की होड़ भी लगी थी। भारत में मकर संक्रांति के पर्व को पतंगोत्सव के तौर पर मनाने का भी रिवाज है। वैसे तो मकर संक्रांति सौर कैलेंडर वर्ष का पहला हिंदू पर्व है जिस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। मुझे याद है बचपन के वे दिन जब मुहल्ले में पंतग उड़ाने की होड़ लगी रहती थी। आज भी वैसे ही है, पर फर्क सिर्फ इतना है कि आज पतंगों को मशहूर हस्ती के नाम पर उड़ाने की होड़ है। कुछ दिन पहले बच्चे लाल, पीली, नीली, काली को पतंग को काटने के लिए दौड़ते थे आज वे शाहरूख, आमिर, अक्षय, धोनी, लालू आदि को काटने के लिए दौड़ते है। क्या इसे समय का बदलाव कहेगे या महशूर हस्तीयों का प्रभाव। पर जो भी हो बिकता तो वही है जो दिखता है, चाहे वे पतंग के रूप में ही क्यों न हो।
Thursday, January 15, 2009
ये जिंदगी एक सवाल है?
ये जिंदगी एक सवाल है?
फिर भी नाज है इस पर
राह चलते मुसाफिर को देखो
लगता है खुशियों ये भरा संसार
पर नजदीक से देखो
तो खुली किताब है
ये जिंदगी एक सवाल है?
किसी को मंजिल मिली
तो किसी आशाएं
इस मायाजाल में सब है समाएं
कोई कर जाता है मंजिल के खातिर कुर्बानी
तो अपनों की खातिर।
फिर भी ये जिंदगी एक सवाल है?
पर क्या जाने उस दर्द को
जो दिल में रह जाता है
अंदर झाकों को मोम सी पिघली जिंदगी है
पर चेहरे पर मासूमियत भरी खुशी है
तो भी ये जिंदगी सवाल है?
फिर भी नाज है इस पर
राह चलते मुसाफिर को देखो
लगता है खुशियों ये भरा संसार
पर नजदीक से देखो
तो खुली किताब है
ये जिंदगी एक सवाल है?
किसी को मंजिल मिली
तो किसी आशाएं
इस मायाजाल में सब है समाएं
कोई कर जाता है मंजिल के खातिर कुर्बानी
तो अपनों की खातिर।
फिर भी ये जिंदगी एक सवाल है?
पर क्या जाने उस दर्द को
जो दिल में रह जाता है
अंदर झाकों को मोम सी पिघली जिंदगी है
पर चेहरे पर मासूमियत भरी खुशी है
तो भी ये जिंदगी सवाल है?
Saturday, January 3, 2009
मन कोमल सा
एक साधारण की लड़की हर बड़े-छोटे शहर में कहीं हालात से कहीं खुद से उलझी। रंग गेहुआ सा। उम्र वहीं कोई बीस बाइस साल। यौवन पर चढ़ाव, मन कोमल सा। भोली-भाली सी सुरत। आंखें सुख झील सा। दिखे जैसे बसंत में खिले सरसों सा। पर उसके अंदर हुक था, जो जान सका न कोई। कहीं खौफ था वजूद खोने का। माने जैसे खो ही गया था उसका वजूद। बचपन में किसी की कहानी सुन उसकी दर्द आंखों में सिमट गया। तब भूलकर भी कभी प्यार न करने को तय किया था। भागमभाग वाली शहर में न जाने कहां से जिंदगी को सुकुन मिला। कई दफा तो ऐसा लगा जैसे मायावी दुनिया का माया तो नहीं। इनसानी जद्दोजहद के गहरे एहसास पिछलकर उसके सीने में उतरता। फिर भी उसकी तलाश खत्म नहीं होती है। उसके सीने में भटकाव का तपिश थी, जो छोटे शहर से खिचते हुए वहां तक लाया था उसको जाने है जिंदगी में बहुत दूर तक। अभी तक वह अकेली चली पर अब क्यों लगता है उसको एक दोस्त की जरूरत है। जिसके लिए अचानक रास्ता बदलकर शहर आ गई थी। वह था साथ-साथ हमेशा उसको महसूस होता था, लेकिन वह चुप थी उसके इंतजार में। कुछ दिन बाद उसकी इंतजार खत्म हुई। एक-दूसरे को प्यार करने लगे, दिन में साथ-साथ रहते पर बातें कम करने लगे, दूर जाते तब उसकी बातें उनकी आंखों में दिखता। अपनापन याद आने लगे। हंसी और पल भर का गुस्सा!!! इस लफ्ज के मायने है उसके लिए। उसके हंसी चेहरे के आगे गम कभी दिखती नहीं, अपनों पर गुस्सा पल भर रहता, जो उसकी अपनेपन को महसूस कराता। बहुतों में वह अलग जिसकी विश्वास उसकी खुशबू बन गई। वह हर पल उसका होता गया और उसकी खुशबू को बयान करने की तलब उतनी बढ़ती गई, पर उसको लगाव भी उसमें इतनी थी। क्यों?क्योंकि दोनों की प्यार दूर होते हुए ज्ज्बाती थी और साथ रिस्तों को विश्वास। औरो से अगल-अलग दुनिया है उसके पास। फिर भी तरसते मिलने को। न जाने कैसा प्यार है जिसको खुदा मानते हैं, क्योंकि खुदा भी दूर रहते हुए एक -दूसरे के पास है। शादय इसलिए अल्फ्जों में बयान नहीं की जा सकती उनकी कहानी को।फिर भी..........सानो को देख नीर कभी सोचा न था, सानो सिर्फ नीर की होना चाहती है। सानो जो अगल थी। उसकी आंखों में वह कशिश थी जो पाने को जी चाहता था। सानो सपना देखा करती थी मंजिल की ऊचाईयों को छूने का। मंजिल की सीढ़ी मिली उसे जाना पड़ा कही दूर सपनों को पूरा करने के लिए। नीर था दूर फिर भी उसके पास था हर दिन बातें होती। दोनों के पास एक धराहर था वह उनकी दूरी। नीर को नौकरी मिली वह भी अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करने लगा। मंजिल मिलता गया कारवां बनता गया न मिटा तो उसका अनुभव। उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी थी कि उसको कोई चाहता है। नीर और सानो अनुभव करते हैं जीवन एक प्रतिध्वनि है। तुम जो करते हो तुम पर बरस जाता है। उनसे परायापन मिट जाता है। सानो मानती है कि एक का दुख दूसरा अनुभव करता है, जो निर्मल होता है। सानो किसी ग्रुप में नौकरी करती थी, वहां का माहौल और लोगों से वाकिफ नहीं थी। नौकरी के दौरान लोगों की स्टाइल, रहन-सहन और चाटुकरा देख सोचती काश में भी..पर खामोश होकर सबकी हरकतें देखती और सोचती ऐसी ही दुनिया है, जहां लोग अपने लाइम लाइट करने के लिए दूसरों का सहारा लेते हैं। सानो के पास आत्मविश्वास और जोश की कमी नहीं, लेकिन वह इतनी भोली थी काई भी अपना उल्लू सीधा कर लें। नीर हर उस माहौल से वाकिफ था जिसकी परछाई आईने में साफ झलकती है। वह कहता औरत/लड़की समाज का आईना है। हर माहौल को अच्छा खराब बना सकती है। औरत देश की ऐसी ताकत है जो पूरी दुनिया को इधर से उधर कर दे, पर उसे किसी सहारे की नहीं सहानुभूति की जरूरत है। सानो ने भी एक सपना देखा था समाज के परदे के पीछे की बदली तस्वीर को दिखाएंगी, लेकिन उनकी जिंदगी में वहीं होने वाला है, जो औरों के साथ होता है।
नववर्ष की शुभकामनाएं
खुशी और गम देने वाले बीते वर्ष 2008 को नई विदा कर नववर्ष 2009 का उम्मीदों का दामन खोले आप सभी ब्लागरों का स्वागत है। नववर्ष में बहुत कुछ नया होने वाला है, पर मैं बीते सालों की कुछ यादों को भूलना नहीं चाहती। शायद इसलिए कि वह मेरे लिए खास है। नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।
Saturday, December 27, 2008
बेबसता की छलक
हट साले..रोज-रोज चला आता है भिख मांगने। तेरे मां-बाप नहीं है क्या? वह चिढ़ते हुए कहा। हर दिन हराम की कमाई खाने की आदत है साले को। ऐसे लोगों की न जात का पता होता है न घरवालों का! ऐ तो अपने जन्म का भोग रहे हैं। ऐसे कहने वाले वही साहब थे, जो हर रोज स्टेशन पर दोस्तों की महफिल लगाए रहते थे। उनकी नजरें हर उस सुंदर लोगों पर रहता था, जो देखने में..ये तो आप समझा सकते हैं। इतने में वहां चार-पांच बच्चे उनकी पांव छूकर कहने लगे माई-बाप पैसे दे दो, खाने को कुछ भी नहीं है। क्यों तेरी मां भाग गई क्या? बेबसता की छलक उनकी आंखों में साफ दिखाई दे रहा है। मगर क्या करते समाज के मारे थे। कुछ ही दूरी पर खड़ी एक बेजान सी महिला लड़खड़ाते चली आ रही थी, उसके कपड़े बिखड़े? बाल फैले थे। उसकी आंखों की नीचे स्याह काले घेरे थे। देख कर लग रहा था जैसे उसका कोई अपना खो गया या उसके साथ कुछ हो गया है। उसकी एक ही रट थी बाबू जी कुछ दे दो! बाबू जी कुछ दे दो! कुछ लोग उसकी लाचारी को देख मजाक कर रहे थे कही गई होगी! फिकरे के साथ मजे ले रहे लोगों में एक भले इनसान बुदबुदाया। अजीब कूढ़मगज लोग है मजे ले रहे हैं, लेकिन लाचार था। ज्यादा कुछ कहता तो लोग कहते ईमानदारी और सहिष्णुता का घुटी पिलाने आया है।
Subscribe to:
Posts (Atom)
SP_A0201.gif)