Saturday, September 13, 2008

सेल


चकचौंध भरी रौशनी में दुनिया को दिखाती नही

स्वत्रंत राज में इन्सान इन्सान के खून से नहाता है

लाशो के ढेर पर खरी है इंसानियत

बाजारों में सेल के भाव बिकती है

इस देश में वफादारी की कसौटी पर संदेह देखती है

अब तो लोकतंत्र की मन्दिर में भी सेल लगने लगी है

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