
आज कि युग में लक्ष्मीजी की माया आपार है। हमारे प्राचीन ग्रन्थों में लिखा है के वे यदि खुश हो जाए तो दुखीराम सुखीराम हो जाए और गंगूतेली भोजराज। मगर इस घोर कलियुग में इन पुराण कथाओं पर लोगों का विश्वास कहां। वे तो अपनी आंखों से सारा चमत्कार देखना चाहते है। लक्ष्मी जी भी कहां चूकने वाली थी वे बोली 'हाथ कंगन को आरसी क्या' उन्होंने छाट-छाटकर लोगों को गदिदयों पर बैठाना शुरू कर दिया। इन छटे-छटाए लोगों के गद्दी पर बैठते ही चाल-ढाल बदल गए। खुदा जब हुस्न देता है तो नजाकत आ जाती है। घोड़ा-गाड़ी, बगला, नौकर-चाकर, हाथ में सत्ता और अंदर माया की बहती नदी मिली नहीं कि करेला नीम पर चढ़ गया। देखते ही देखते गद्दीधायिों की काया कचौरियों की तरह फूलने लगी। गृहणियां गुबारे और बच्चे फूटबाल की तरह फूल गए। नामी बेनामी खाते बैंकों में खुले जायदादे बने, हवाई उड़ाने उड़ी और कल कर कलवा आल का कालूराम हो गया। चारों तरफ माया फैल गई तो आदमी को आदमी समझने की आवश्यकता उन्हें कैसी रहती? जो कह दिया वह कानून, जो कर दिया वह न्याय। लोग करते भी क्या? चुप्पी साधे गए क्योंकि वे जानते थे कि मुंह खुला तो बिके बारह के भाव। कहां फंसवा दिया, कहां फिकवा दे कोई नहीं जानता। महालक्ष्मीजी की कृपा से उनके चारों ओर सुख-शांति की नदी बह रही थाी। खुशीराम उनकी जय जयकार करते नहीं थकते। नतीजा यह हुआ कि उनके साथ-साथ उनके सगे संबंधी, चमचे-तमचे आदि उसी तरह दिन-दुनी रात चौंगुनी तरक्की करने लगे। जैसे खेती के साथ खरपतवार। एक स्थिति तो यह भी आई कि माया को कैसे समेटे, कहां रखे? जगह नहीं मिली तो प्रेमिकाओं को कोठियां बनकर दी, उनके तलघरों में माया छुपाई, बेनामी सौदे में खफाई। मगर बाहरी लक्ष्मी तुम्हारी माया छिपाए न छिपे। लाकर, तहखाने सब गले-गले तक मारे गए। इन गद्दीधारियों की चहुमुखाी प्रगति देखकर पूरे देश में गद्दी हथियाने की होड़ लग गई। रातोंरात चोर उच्चके, दस-नंबरीयों, तस्कर गैंगबाज हो गए। जनता के चरणों में लोटने लगे, भाग्य विधाताओं एक बार हमें भी लोटने का मौका दो और देखो हम आपको आसमान के तारे तोड़कर न दे तो हमारा नाम बदल देना। बेचारी भोली भाली जनता झांसे में आ गई और कई बगुलों को कंधों पर उठाकर गद्दी पर बिठा दिया। बस यही तो चाहिए था। सत्ता हाथ में आते ही लगे दोनों हाथों माया से खेलने। अभी तक दूध में पानी, आटे में नमक सब चल रहा था मगर उन्होंने आते ही उल्टी गंगा बहा दी। पानी में दूध और नमक में आटा मिलाया। किसी ने शिकायत की तो मजा चखवा दिया। सिमेंट की जगह रेट के पुल, बांध, सड़के और इमारतें बनने लगी। नतीजे सामने आने लगे तो पढ़-पढ़ाए आयोग बिठा दिया और उन्हें लीपा-पोती करने का पट्टा दे दिया। जब पानी सिर से ऊपर हो गया तो कुछ बेचारे गरीब लोगों ने गुहार लगाई। महालक्ष्मी जी ये क्या करवा रही हो? हमारे शरीर पर अब केवल चमड़ी बची है, अब तो हम पर रहम करो। वे भोली बनकर बोली क्या हुआ भक्तजनों? भक्तजनों ने जबाव दिया- मां, गद्दीधारीयों एक भंयकर रोग से पीड़ित है 'रोग का नाम है खाओ-खाओ रोग'। गद्दीधारियों की भूख इतनी बढ़ गई है कि वे रेल, पुल, सड़क, बांध, भवन, पशुचारा, मशीनें, टेलीफोन खंभे, हवा, कपड़ा और पानी के जहाज जमीन जायजाद सहित सबकुछ खाने पर आमद है। फिर भी उनकी भूख नहीं मिट रही। रिश्वत दलाली, नजराना, शुक्रराना तो पुरानी पंरपरा थी ही अब तो ऐसा लग रहा है कि चारों दिशाओं से गद्दीधारी लोग देश को खाने पर उतारू है। सोचो लक्ष्मी मां, उत्तर में हिमालय और कश्मीर, दक्षिण में केरल और तमिलनाडू, पूर्व में बंगाल और उड़ीसा और वश्चिम में गुजरात महाराष्ट्र को खाने के लिए लोग टूट पड़े तो इस देश को नष्ट होने में कितनी देर लगेगा। लक्ष्मीजी आंख बंद की तो उनके माथे पर चिंता की लकीर उभर आई। वे आधे सेंटीमीटी मुस्कराई और बोली अच्छा मिली बिल्ली मुझे ही म्याऊ। मुझे ही खाने पर उतर आए मेरे बनाए लोग? ठीक है लो मेरी अब यह माया भी देखो। सारे गरीब भुखमरे भौंचक्के होकर लक्ष्मीजी की माया देखने लगे। लक्ष्मी जी ने रातोंरात लोगों में ऐसी चेतना लगाई की वे गिन-गिनकर इन खाओ-खाओ रागे से पीड़ित गद्दीधारियों को गद्दी से खींचकी सड़क पर पटकने लगी। कुछ ने हिम्मत करके उनका कच्चा-चिट्टा जुटाया और पुलिस के हवाले कर दिया। कमाल है जो पुलिस कल तक अंधे, बहरे, गंगू का रोल कर रहे थी वह एकदम डंडा उठाकर इन आरोपियों पर उठ पड़ी और सबको हवालात में बंद कर कानून के हवाले कर दिया। लक्ष्मी जी की माया से न्यायालय भी चैतन्य हो गए और गिन-गिनकर उन सबको जेल में बंद करवा दिया। बड़े-बड़े धुरधरों को जेलों में चटाई पर सोते और खटमलों, मच्छरों से सम्मेलनों की अध्यक्षता करते हुए देखकर लक्ष्मीजी भाव-विभोर हो रही थी। पूरे देश में हड़कंप मंच गया। अभूतपूर्व लोग भूतपूर्व लोग और वर्तमान महान लोग धूल धूसरित हो गए। बेचारी जनता आंखें फाड़-फाड़कर उनके काले करनामें अखबारों और टेलीविजन में देखकर भौंचक्के हो रही थी। ऐसे यह आलकल राजनैतिक पर लक्ष्मीजी का अपार माया।
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1 comment:
माया है तो दुनिया है, दुनिया है तो माया है!
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