वह पिपल की छांव, खुली आकाश में हमारा बचपन
वह बलखाती सी हवाएं, अमृत सा धूप
जिस पर कुर्बान थी हमारी बचपन की शरारतें
आज तड़पाती है बचपन की नदानी भरी शरारतें
गर्मी की छुट्टी में गांव जाना
हरियाली की छांव तले रहना
फूलों से घिरी लताएं के बीच महलों में रहना
आसपास फल-फूलों से भरी बगीचों में रंग-बिरंगे तितलियों का आना
और भौंरो का गुनगुनाना
इस कोमल मन में तंरग भर जाता था
ज्येष्ठ की दोपहर में दौड़-दौड़ कर बगीचों में जाना
जिस पर बड़ों का डांट पड़ना
आज तड़पाती है बचपन की नदानी भरी शरारतें
एक अपार शांमिमयी सुबह शाम थी
न साजिश न जज्बातों की टक्कर थी
हर जगह सुनहरी ख्याबों से भरी दुनिया थी
जब पड़ा उग्र का लंगर तब फिजा वही थी
सिर्फ हवाएं की रुख बदली थी
आज तड़पाती है बचपन की नदानी भरी शरारतें
उतर चुका है, फिर भी आकाश में रोशनी है
ढल चुका है बचपन, युवा हो मन में आज भी कही बचपन है
इसलिए आज भी तड़पाती है बचपन की नदानी भरी शरारतें
Saturday, December 20, 2008
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6 comments:
बहुत उम्दा अंदाज़ और शब्द
कविता पढ़ कर मन बचपन में लौट गया
खूबसूरत होती हैं बचपन की यादें
really childhood is a gift...nice post..keep writing
भाव और िवचार के समन्वय से रचना प्रभावशाली हो गई है । अच्छा िलखा है आपने । जीवन के सत्य को सामाियक संदभोॆं में यथाथॆपरकर ढंग से अिभव्यक्त िकया है । मैने अपने ब्लाग पर एक लेख िलखा है-आत्मिवश्वास के सहारे जीतें िजंदगी की जंग-समय हो तो पढें और अपनी कीमती राय भी दें-
http://www.ashokvichar.blogspot.com
बहुत सुंदर रचना के लिए ढेरों बधाई स्वीकारें
bachpan ko ham sabhi miss karte hai,bachpan ki yado me le jane, aankho me kuch nami aur hotho par ek hasi lane ke liye shukriya.
-------------------------"VISHAL"
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