Saturday, January 3, 2009

मन कोमल सा

एक साधारण की लड़की हर बड़े-छोटे शहर में कहीं हालात से कहीं खुद से उलझी। रंग गेहुआ सा। उम्र वहीं कोई बीस बाइस साल। यौवन पर चढ़ाव, मन कोमल सा। भोली-भाली सी सुरत। आंखें सुख झील सा। दिखे जैसे बसंत में खिले सरसों सा। पर उसके अंदर हुक था, जो जान सका न कोई। कहीं खौफ था वजूद खोने का। माने जैसे खो ही गया था उसका वजूद। बचपन में किसी की कहानी सुन उसकी दर्द आंखों में सिमट गया। तब भूलकर भी कभी प्यार न करने को तय किया था। भागमभाग वाली शहर में न जाने कहां से जिंदगी को सुकुन मिला। कई दफा तो ऐसा लगा जैसे मायावी दुनिया का माया तो नहीं। इनसानी जद्दोजहद के गहरे एहसास पिछलकर उसके सीने में उतरता। फिर भी उसकी तलाश खत्म नहीं होती है। उसके सीने में भटकाव का तपिश थी, जो छोटे शहर से खिचते हुए वहां तक लाया था उसको जाने है जिंदगी में बहुत दूर तक। अभी तक वह अकेली चली पर अब क्यों लगता है उसको एक दोस्त की जरूरत है। जिसके लिए अचानक रास्ता बदलकर शहर आ गई थी। वह था साथ-साथ हमेशा उसको महसूस होता था, लेकिन वह चुप थी उसके इंतजार में। कुछ दिन बाद उसकी इंतजार खत्म हुई। एक-दूसरे को प्यार करने लगे, दिन में साथ-साथ रहते पर बातें कम करने लगे, दूर जाते तब उसकी बातें उनकी आंखों में दिखता। अपनापन याद आने लगे। हंसी और पल भर का गुस्सा!!! इस लफ्ज के मायने है उसके लिए। उसके हंसी चेहरे के आगे गम कभी दिखती नहीं, अपनों पर गुस्सा पल भर रहता, जो उसकी अपनेपन को महसूस कराता। बहुतों में वह अलग जिसकी विश्वास उसकी खुशबू बन गई। वह हर पल उसका होता गया और उसकी खुशबू को बयान करने की तलब उतनी बढ़ती गई, पर उसको लगाव भी उसमें इतनी थी। क्यों?क्योंकि दोनों की प्यार दूर होते हुए ज्ज्बाती थी और साथ रिस्तों को विश्वास। औरो से अगल-अलग दुनिया है उसके पास। फिर भी तरसते मिलने को। न जाने कैसा प्यार है जिसको खुदा मानते हैं, क्योंकि खुदा भी दूर रहते हुए एक -दूसरे के पास है। शादय इसलिए अल्फ्जों में बयान नहीं की जा सकती उनकी कहानी को।फिर भी..........सानो को देख नीर कभी सोचा न था, सानो सिर्फ नीर की होना चाहती है। सानो जो अगल थी। उसकी आंखों में वह कशिश थी जो पाने को जी चाहता था। सानो सपना देखा करती थी मंजिल की ऊचाईयों को छूने का। मंजिल की सीढ़ी मिली उसे जाना पड़ा कही दूर सपनों को पूरा करने के लिए। नीर था दूर फिर भी उसके पास था हर दिन बातें होती। दोनों के पास एक धराहर था वह उनकी दूरी। नीर को नौकरी मिली वह भी अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करने लगा। मंजिल मिलता गया कारवां बनता गया न मिटा तो उसका अनुभव। उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी थी कि उसको कोई चाहता है। नीर और सानो अनुभव करते हैं जीवन एक प्रतिध्वनि है। तुम जो करते हो तुम पर बरस जाता है। उनसे परायापन मिट जाता है। सानो मानती है कि एक का दुख दूसरा अनुभव करता है, जो निर्मल होता है। सानो किसी ग्रुप में नौकरी करती थी, वहां का माहौल और लोगों से वाकिफ नहीं थी। नौकरी के दौरान लोगों की स्टाइल, रहन-सहन और चाटुकरा देख सोचती काश में भी..पर खामोश होकर सबकी हरकतें देखती और सोचती ऐसी ही दुनिया है, जहां लोग अपने लाइम लाइट करने के लिए दूसरों का सहारा लेते हैं। सानो के पास आत्मविश्वास और जोश की कमी नहीं, लेकिन वह इतनी भोली थी काई भी अपना उल्लू सीधा कर लें। नीर हर उस माहौल से वाकिफ था जिसकी परछाई आईने में साफ झलकती है। वह कहता औरत/लड़की समाज का आईना है। हर माहौल को अच्छा खराब बना सकती है। औरत देश की ऐसी ताकत है जो पूरी दुनिया को इधर से उधर कर दे, पर उसे किसी सहारे की नहीं सहानुभूति की जरूरत है। सानो ने भी एक सपना देखा था समाज के परदे के पीछे की बदली तस्वीर को दिखाएंगी, लेकिन उनकी जिंदगी में वहीं होने वाला है, जो औरों के साथ होता है।

5 comments:

surendra said...

नारी पीडा की मोहक अभिव्यक्ति की है इसके लिए साधुवाद

महेन्द्र मिश्र said...

औरत देश की ऐसी ताकत है जो पूरी दुनिया को इधर से उधर कर दे, पर उसे किसी सहारे की नहीं सहानुभूति की जरूरत है........
नारी पीड़ा के बारे में विचारणीय पोस्ट. काफी हद तक आपके विचारो से सहमत हूँ .

shivraj gujar said...

achhi rachana. bhavnaon bahut achha chitran. badhai.

Vinay said...

नौकरी के दौरान लोगों की स्टाइल, रहन-सहन और चाटुकरा देख सोचती काश में भी..पर खामोश होकर सबकी हरकतें देखती और सोचती ऐसी ही दुनिया है, जहां लोग अपने लाइम लाइट करने के लिए दूसरों का सहारा लेते हैं।

क्या करें, दुनिया ही ऐसी होती जा रही है! सुन्दर रचना है!

सुशील छौक्कर said...

सच को बयान कर दिया। शब्दों के भाव बहुत कुछ कह गए।