Saturday, January 17, 2009

रिश्तों का संबंध

रिश्ते के बीच जीना आसान नहीं होता
जीवन में दिल से रिश्तों का बनना आसान नहीं होता
जिंदगी में ऐसे मोड़ आए कि मन में रिश्तों का लगाव हो गया
फैसलों से फासले कुछ इस तरह से तय हुए कि
अनछूए रिश्ते दिल में बरबस हो गया
अपनत्व का रिश्ता दिल से दिल का है
तभी तो रिश्तों के बीच जीते हैं
इस युग में लोगों की अचानक ही होगा मूल्यांकन
कुछ सच है कुछ झूठ वह भी मन के रिश्तों के बीच
केवल सुखद भ्रमों में जीती रहती थी मैं
अपने मन को बेगानों पर लूटा अपनत्व ढूढ़ती थी
एक नया धरातल आया था, जहां फासले खुद खड़े थे?
मन के रिश्ते महलों की तरह खंडहर होने का था
फिर भी आस था जिंदगी में अपने मन की रिश्तों के बीच जीना का
हर दिन नया ख्याब, हर सुबह नया एहसास,हर शाम खुशी व गम का मिलनहर रात मन में नया सवाल?क्या अनुभव था रिश्तों के बीच लगव का
किसी के साथ मन का लगाव या मन से रिश्तों का हर पल अनुभव करती है जो ताह
जिंदगी हर रिश्तों के बीच याद आएगी।

4 comments:

के सी said...

सच है ये की आपकी कविता मुझे पसंद आई।

आलोक साहिल said...

monika ji,fantastic........
ALOK SINGH "SAHIL"

संगीता पुरी said...

अच्‍छी कविता है...बधाई।

michal chandan said...

मोनिका जी, रिश्तों के बीच खुल कर जीना सचमुच आसान नहीं होता। आज जीवन मे कई रिश्ते बनते- बिगडते, उलझते-सुलझते रहते हैं। पारिवारिक, कार्यक्षेत्र, दोस्ती और मानवीय संवेदनाओं के। हमारे समाज मे भी हर तरह के रिश्ते का अपना एक विशेष महत्व है. लेकिन अब धीरे-धीरे सब कुछ बदल रहा है...अच्छी रचना है, हमारी ढेर शुभकामनाएं।