
भूख से तड़प रही जिंदगी
किसी का आसियाना खो गया
तो किसी का अपना खो गया।
बिहार में कोसी नदी में आयी प्रलयंकारी बाढ़ फिल्मी नहीं है, लेकिन इसने कई ऐसी त्रासद कहानियां छोड़ी हैं जो फिल्मों में ही दिखती हैं कि पानी के प्रवाह में पूरा का पूरा हंसता खेलता परिवार बिखर जाए और फिर एक-दूसरे को ढूंढता फिरे। बिहार में कोसी नदी से आई बाढ़ ने जहां लोगों को घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया है, वहीं संकट की इस घड़ी में मानवता के धर्म के चलते सभी मजहबी दीवारें भी ढह गई हैं। भारतीय परंपरा में नदियां जीवन दायिनी मानी जाती हैं। मां भी जीवन देती है, लेकिन बिहार के लिए शाप बन चुकी कोसी में आयी प्रलयंकारी बाढ़ में सबकुछ गंवाने वाली एक मां रेलवे स्टेशन पर बिलख रही है। क्योंकि अपने दुधमुंहे को पिलाने के लिए उसके आंचल में दूध नहीं उतर रहा है। प्राकृतिक आपदा में लोगों के सिर ढांपने की जगह बने पूर्णिया रेलवे स्टेशन पर शरण लिए झुनकी अपने चार महीने के दुघमुंहे ब'चे को गोद में लिए बिलख रही है। पिछले कई दिनों से बाढ़ में फंसे रहने और भूखे रहने के कारण उसकी इतनी सामर्थ्य नहीं बची कि भूख से तड़प रहे रोते बिलखते अपने ब'चे को स्तनपान कराकर उसकी पेट की आग बुझा सके। झुनकी के साथ आयी मधेपुरा जिले के सौर बाजार की रहने वाली उसकी पड़ोसन अहल्या उसे रोता देख ढांढस बंधाने का प्रयास करती है, लेकिन आंसू हैं कि थमते ही नहीं। थमे भी कैसे। ब'चा भूखा है।सहरसा जिले में खाकी पैंट पहने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यकर्ता अपने बाढ़ पीडि़त रोजेदार मुस्लिम भाइयों को पवित्र महीने रमजान में इफ्तार करा रहे हैं। यह नजारा सहरसा के जिला स्कूल परिसर में संघ परिवार के एक घटक सेवा भारती द्वारा चलाए जा रहे एक राहत शिविर का है। यहां रमजान में रोजा रखने वाले मुस्लिम समुदाय के लगभग 100 लोगों को आरएसएस के कार्यकर्ता अजान होते ही मुढी और घुधनी परोस कर उन्हें रोजा इफ्तार करा रहे हैं। मधेपुरा जिले के परमा गांव निवासी मो. सलाउद्दीन राहत शिविर में अपने परिवार के साथ एक सप्ताह से यहां शरण लिए है। उनके साथ कोई भेदभाव नहीं बरता गया। ऐसा ही कुछ नजारा मधेपुरा स्थित एक मुस्लिम मदरसा के छात्रावास का भी है, जहां कुमारखंड और मुरलीगंज के विभिन्न इलाकों से अपनी जान बचाकर आए साठ से अधिक साधु शरण लिए हुए हैं। इन्हें यहां के मुस्लिम शिक्षक और छात्रों द्वारा न केवल उनके आवास और भोजन की व्यवस्था की गई है, बल्कि उन्हें यहां पूजा पाठ करने के लिए उन्होंने एक खास स्थान भी दे रखा है। मधेपुरा स्थित मदरसा के छात्रवास में शरण लिए साधु महेन्द्र साह को छात्रावास में किसी तरह की कोई कठिनाई नहीं है। पूर्णिया जिले के भनगाहा निवासी सुप्रिया देवी भाग्यशाली नहीं रही और उसने बचाव कार्य मे लगे सेना के जवानों से हाथ जोड़ते हुए कहा कि वे बाढ़ में फंसे उसके पति और ब'चों को बचा लें। कोसी में आई इस प्रलयंकारी बाढ़ ने अमीर-गरीब सभी को एक जैसा बना दिया है। अब वे राहत शिविरों में एक साथ सोते और खाते पीते हैं। संकट के इस घड़ी में भी सबकुछ लुटा चुके ये लोग थोड़ी सी खुशी मिलने पर भी सारे गमों को भूलकर उसका आनंद उठाने में कोई संकोच नहीं करते। ऐसा ही माहौल सहरसा जिले के आर जे महिला कालेज परिसर में स्थित राहत शिविर में है, जहां रुपा नामक एक महिला ने एक ब'ची को जन्म दिया है और उसके छठी के अवसर पर महिलाएं एकत्रित होकर सोहर गीत गा रही हैं। ब'चे के जन्म पर सोहर गया जाता है। रुपा के पति सुरेन्द्र का कहना है कि वे अपनी इस बिटिया का नाम इसी नदी के नाम पर कोसी रखेंगे जिसने उनका सबकुछ तबाह और बर्बाद कर दिया है, ताकि कोसी मइया उन्हें भविष्य में और किसी विपदा में न डाले। कोसी प्रक्षेत्र के बाढ़ प्रभावित लोग तीन सौ किलोमीटर की यात्रा कर पटना रेलवे स्टेशन पहुंच रहे हैं और उनके आने से रेलवे स्टेशन पर एक बड़े राहत शिविर जैसा नजारा है। बाढ़ की स्थिति में कुछ सुधार आते ही इस जल प्रलय में एक-दूसरे से बिछड़े गए लोग अपनों की तलाश में एक राहत शिविर से दूसरे राहत शिविर का चक्कर लगा रहे हैं और उनकी आंखों में अब भी तबाही का खौफ तारी है। सुरक्षित ठिकानों की ओर भागने के क्रम में मधेपुरा जिले के बुधमा गांव निवासी सावित्री देवी पथराई आंखों से रेलवे स्टेशन बस अड्डा और विभिन्न राहत शिविरों में अपने पति और दो पुत्रियों को ढूंढती फिर रही हैं, जो जीवन बचाने के दौरान उनसे बिछड़ गऐ। बाढ़ त्रासदी से पूर्व संपन्न किसान रहे सुपौल जिले के जीवछपुर निवासी जगदीश भगत की भी ऐसी ही हालत है। वह भी अपने परिवार के सदस्यों की तलाश में इधर-उधर भटकते फिर रहे हैं। ये अपने बिछड़े परिजनों की तलाश में सुबह होते ही निकल पड़ते हैं और रात होने पर थक हार कर मायूस फिर अपने राहत शिविर में लौट आते हैं। पिछले कई दिनों से उनकी यही दिनचर्या है, लेकिन इसी आस में कि उनसे कहीं न कहीं मुलाकात हो ही जाएगी उनकी यह कोशिश जारी है।70 वर्षीय जगदीश भगत अपने गृह जिला से 75 किलोमीटर की दूरी पर फारबिसगंज में एक राहत शिविर में शरण लिए हुए हैं। घर से भागने के समय उनकी दो बहुएं और छह पौत्र पौत्रियां वहां छूट गई। भगत ने बताया कि वह अपने घर के बाहर थे तभी गांव में बाढ़ का पानी प्रवेश कर गया और देखते ही देखते पानी छाती तक पहुंच गया और अपनी जान बचाने के लिए वह एक पेड़ पर चढ़ गए। दो दिनों के बाद सेना की एक बोट की मदद से वे यहां पहुंचे और मारवाड़ी अतिथि सदन में शरण लिए हुए हैं। भगत के सबसे बडे पुत्र अपने परिवार के साथ काठमांड़ में रहते हैं, जबकि उनके दो छोटे पुत्र चेन्नई में काम करते हैं जिनकी पत्नी और छह ब'चों के साथ वे जीवछपुर में रह रहे थे। पश्चाताप की मुद्रा में भगत बताते हैं कि वे अपने दोनों छोटे पुत्रों का सामना कैसे करेंगे और उन्हें क्या यह कहेंगे कि अपनी जान बचाने के लिए उनके परिवारों को छोड़कर वे भाग खडे़ हुए। उनके पास पुत्रों का फोन नंबर भी नहीं है। नरपतगंज के मजदूर भुवन यादव की भी स्थिति कुछ ऐसी है। यादव बताते हैं कि 27 अगस्त को पानी का स्तर रात आठ बजे मात्र दो फुट था और थोड़ी देर में वह बढकर पांच फुट हो गया जिसकी वजह से वे भागने पर मजबूर हुए। उन्होंने बताया कि जिस वक्त उन्होंने घर छोड़ा था उनकी पत्नी और पुत्र उनके मकान से कुछ दूरी पर एक अन्य ग्रामीण के घर में टीवी देख रहे थे और उन्हें बढते जलस्तर ने इतनी भी मोहलत नहीं दी कि वे उन तक पहुंच पाएं। फारबिसगंज के ली अकेडमी हाईस्कूल परिसर में स्थित राहत शिविर में शरण लिए यादव बताते हैं कि उन्हें नहीं पता है कि अब उनकी पत्नी और पुत्र कहां है और भविष्य में उन्हें वे देख पाएंगे भी या नहीं। पूर्णिया शहर के किनारे स्थित अनूपनगर-बेलौरी में एक राहत शिविर में अपने दो ब'चो के साथ शरण ली मधेपुरा जिले के काशीपुर निवासी सब्रुन्निसा पूरी तरह टूट चुकी हैं। अपने पांच वर्षीय पुत्र मो. रजा के बाढ़ के तेज बहाव में बह जाने से गमजदा सब्रुन्निसा ने पिछले कई दिनों से भोजन करना छोड़ दिया है। उसी राहत शिविर शरण ली एक अन्य महिला अमीना अश्रुपूर्ण नेत्रों के साथ सब्रुन्ननिसा की ओर इशारा करते हुए बताती हैं कि उसे जब इस बात की जानकारी है कि उसका पुत्र मर चुका है तो ऐसे उसके हलक से भोजन कैसे उतरेगा। सब्रुन्निसा भले खुद खाना नहीं खा रही है, लेकिन वह अपने दोनों जीवित बचे ब'चों को अपने हाथों से खिचड़ी खिलाती है।किसी प्रकार भागकर फारबिसगंज और वहां से रेल से पूर्णिया पहुंचे मधेपुरा जिला के कुमारखंड निवासी संपन्न किसान राजेन्द्र सरदार की यहां रिक्शाचालक रामधनी से मुलाकात हो जाती है और वह उन्हें फटे कपड़ों और भूखे प्यासे देखकर अचंभित रह जाता है। रामधनी ने बताया कि सरदार उनके मालिक थे और रिक्शा चलाने से पहले वह उनके खेतों में काम किया करता था। वर्तमान में सरदार रामधनी के साथ उसकी झोपड़ी में रह रहे हैं।
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3 comments:
आपने एकदम टू द पोइण्ट लिखा है .
Bahut accha...likhte rahiye
likhti rahen...ham padhne aate rahenge...Word Verification kii badha hata den
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