Sunday, December 7, 2008

बातों की अनकही..


बातों की अनकही कोई क्या जाने,न भी जाने तो क्या जाने, जाने भी तो क्या जाने, बातों का छलावा तो बहुत करते है, कोई खुद उस छलावा को जाने तो समझे,ख्वाबों के टूटने का गम नहीं, जितनी बातों के बदले का होता है, दर्द तो ख्वाबों के टूटने का भी होता है, पर उस दर्द का क्या जो बन जाता किसी का फसाना, दिन बितते गए रात ढलती रही पर न बदला तो उसका.., गलती उसकी नहीं गलती उस वक्त की जो किसी के विश्वास और भावनाओं को बांध नहीं पाया। समझते दोनों थे पर जज्बातों का उल्लेख करूं क्या...!

2 comments:

ram shankar said...

bahut achchha, kya dil ka dard ukera hai aapne...

परमजीत सिहँ बाली said...

bahut sundar Bhaavapurn abhiviyakti