Friday, January 16, 2009

जुड़ी थी जमीं के तार

शहरों में न सिर्फ आसमान की रंगीनी एक जैसी थी, बल्कि जमीन पर लोगों का उत्साह भी एक जैसा ही था। चांद, तारा, कंठा बेलन, छड़ीला, अद्घा और मोमबत्ता की डोर थामे बच्चे बूढ़े सब न सिर्फ अपनी पतंगबाजी कौशल को आजमाए थे, बल्कि दूसरे के पतंग की डोर काटने की होड़ भी लगी थी। भारत में मकर संक्रांति के पर्व को पतंगोत्सव के तौर पर मनाने का भी रिवाज है। वैसे तो मकर संक्रांति सौर कैलेंडर वर्ष का पहला हिंदू पर्व है जिस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। मुझे याद है बचपन के वे दिन जब मुहल्ले में पंतग उड़ाने की होड़ लगी रहती थी। आज भी वैसे ही है, पर फर्क सिर्फ इतना है कि आज पतंगों को मशहूर हस्ती के नाम पर उड़ाने की होड़ है। कुछ दिन पहले बच्चे लाल, पीली, नीली, काली को पतंग को काटने के लिए दौड़ते थे आज वे शाहरूख, आमिर, अक्षय, धोनी, लालू आदि को काटने के लिए दौड़ते है। क्या इसे समय का बदलाव कहेगे या महशूर हस्तीयों का प्रभाव। पर जो भी हो बिकता तो वही है जो दिखता है, चाहे वे पतंग के रूप में ही क्यों न हो।

4 comments:

मोहन वशिष्‍ठ said...

बिल्‍कुल सही लिखा है आपने मकर संक्रांति बनाम पंतंगोत्‍सव

Himanshu Pandey said...

सही कहा- बिकता तो वही है जो दिखता है.
धन्यवाद.

संगीता पुरी said...

सटीक बातें कही हैं।

Udan Tashtari said...

जो भी हो बिकता तो वही है जो दिखता है...

-सही है.