रिश्ते के बीच जीना आसान नहीं होता
जीवन में दिल से रिश्तों का बनना आसान नहीं होता
जिंदगी में ऐसे मोड़ आए कि मन में रिश्तों का लगाव हो गया
फैसलों से फासले कुछ इस तरह से तय हुए कि
अनछूए रिश्ते दिल में बरबस हो गया
अपनत्व का रिश्ता दिल से दिल का है
तभी तो रिश्तों के बीच जीते हैं
इस युग में लोगों की अचानक ही होगा मूल्यांकन
कुछ सच है कुछ झूठ वह भी मन के रिश्तों के बीच
केवल सुखद भ्रमों में जीती रहती थी मैं
अपने मन को बेगानों पर लूटा अपनत्व ढूढ़ती थी
एक नया धरातल आया था, जहां फासले खुद खड़े थे?
मन के रिश्ते महलों की तरह खंडहर होने का था
फिर भी आस था जिंदगी में अपने मन की रिश्तों के बीच जीना का
हर दिन नया ख्याब, हर सुबह नया एहसास,हर शाम खुशी व गम का मिलनहर रात मन में नया सवाल?क्या अनुभव था रिश्तों के बीच लगव का
किसी के साथ मन का लगाव या मन से रिश्तों का हर पल अनुभव करती है जो ताह
जिंदगी हर रिश्तों के बीच याद आएगी।
Saturday, January 17, 2009
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4 comments:
सच है ये की आपकी कविता मुझे पसंद आई।
monika ji,fantastic........
ALOK SINGH "SAHIL"
अच्छी कविता है...बधाई।
मोनिका जी, रिश्तों के बीच खुल कर जीना सचमुच आसान नहीं होता। आज जीवन मे कई रिश्ते बनते- बिगडते, उलझते-सुलझते रहते हैं। पारिवारिक, कार्यक्षेत्र, दोस्ती और मानवीय संवेदनाओं के। हमारे समाज मे भी हर तरह के रिश्ते का अपना एक विशेष महत्व है. लेकिन अब धीरे-धीरे सब कुछ बदल रहा है...अच्छी रचना है, हमारी ढेर शुभकामनाएं।
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